वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रून्प्रताप्य वीर्येण स कथं मर्तुमिच्छसि ||
३७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
शत्रून्विध्वंसय़िष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान् ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
शत्रून्विध्वंसय़िष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान् |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
शत्रून्व्यपोहत्समरे महात्मा; वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शत्रून्सम्यग्विजानन्ति दुर्वला ये वलीय़सः |
१७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रून्हत्वा महीं लव्ध्वा स्वधर्मेणोपपादिताम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
शत्रून्हत्वा हतस्याजौ शूरस्याक्लिष्टकर्मणः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शत्रोरन्नाद्यभूतः सन्क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च |
१६७ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
शत्रोरपि प्रपन्नस्य सोऽनृशंसः प्रतापवान् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
शत्रोरपि महेन्द्रस्य वज्रसंहननो युवा ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
शत्रोरृद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
शत्रोर्मय़ाभिपन्नानां भूतानां ध्वजवासिनाम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
शत्रोश्च मोक्षणं क्लेशात्त्रीणि चैकं च तत्समम् ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ूपप्रभृतय़ः कुरुक्षेत्रनिवासिनः ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमव्रवीत् ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ूपस्य कौरव्य धृतराष्ट्रस्य चैव ह ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ूपाश्रमे तस्मिन्निवासमकरोत्तदा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शतय़ोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
शतय़ोजनविस्तारं न शक्ताः सर्ववानराः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
शतय़ोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वं च भारत |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ोजनविस्तारे मणिमुक्ताचय़ाचिते |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
शतय़ोजनविस्तीर्णं तावदेवाय़तं शुभम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
शतय़ोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम् ||
५७ ग
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
शतय़ोजनविस्तीर्णमर्णवं सहसाप्लुतः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
शनकैरिव दाशार्हमर्जुनो वाक्यमव्रवीत् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमव्रवीत् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
शनैः पर्यपतत्पक्षी पर्वतान्प्रविशातय़न् ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
शनैः शनैरुपरमेद्वुद्ध्या धृतिगृहीतय़ा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
शनैः शनैर्महाराज दर्शय़न्ति स्म ते वलम् ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
शनैः शनैर्महाराज प्रास्पन्दत सचेतनः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
शनैः शनैस्तदान्योन्यमव्रुवन्स्वमतान्युत ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
शनैः शनैस्तांश्च निरीक्ष्य रामो; जनार्दनं प्रीतमना ददर्श ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
शनैः साधु भवान्यातु व्रह्महत्यामनुस्मरन् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शनैरलभत प्राणान्पुत्रव्यसनकर्शितः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
शनैरुत्थाय़ भगवान्प्रविवेश कुटीमठम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
शनैरुद्वीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमव्रवीत् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शनैरुपेय़ुरन्योन्यं योत्स्यमानानि संय़ुगे ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवानलः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
शनैर्याहीति यन्तारमव्रवीत्प्रहसन्निव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
शनैर्विश्रम्भय़न्नश्वान्याहि यत्तोऽरिवाहिनीम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
शनैर्विश्रामय़न्सेनां स यय़ौ येन पाण्डवः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
शनैश्चरः पीडय़ति पीडय़न्प्राणिनोऽधिकम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
शनैश्चरः सूर्यपुत्रो भविष्यति मनुर्महान् |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
शनैश्चोत्सादितस्तत्र स्नानशालामुपागमत् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
शनैस्तदा परिय़यौ श्वेताश्वश्च महारथः ||
२२ ख