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उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
शमं चेद्याचमानस्त्वं न धर्मं तत्र लप्स्यसे |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
शमं तत्र लभेय़ं चेद्युष्मदर्थमहापय़न् |
८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
शमं नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तय़न् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
शमं प्रति महावाहो हितार्थं सर्वदेहिनाम् ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय ११
मैत्रेय़ उवाच
शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन्यथा तथा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
शमं राजा धृतराष्ट्रोऽभिनन्द; न्नय़ोजय़त्त्वरमाणो रथं मे |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
शमः कामश्च हर्षश्च तेजसा लोकधारिणः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
शमकामः सदा पार्थो दीर्घप्रेक्षी युधिष्ठिरः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शमठोऽकथय़द्राजन्नामूर्तरय़सं गय़म् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
शमनं सर्वभूतानां सर्वलोककृतोद्यमम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
शममिच्छति दाशार्हस्तव दुर्योधनस्य च |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
शममेव परं मन्ये न तु मोक्षाद्भवेच्छमः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
शमश्च दृष्टः परमं वलं च; ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् |
१०५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
शमश्च नन्दिवेगानामित्येते कुलपांसनाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
शमात्मकं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
सत्यवत्यु उवाच
शमात्मकमृजुं पुत्रं लभेय़ं जपतां वर ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
सत्यवत्यु उवाच
शमात्मकमृजुं पुत्रं लभेय़ं जपतां वर ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
शमार्थं याचमानस्य पक्षय़ोरुभय़ोर्हितम् ||
१४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
शमार्थं सर्वय़ोधानां शृणु चेदं वचो मम ||
३४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
शमीकं च महात्मानं पुत्रं तं चास्य शृङ्गिणम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसंनिधौ ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
शमीको नाम राजेन्द्र विषय़े वर्तते तव |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
शमीगर्भमथासाद्य ननाश भगवांस्ततः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
शमीपलाशपुंनागाः समिधो मधुसर्पिषी |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
शमीपीलुकरीरैश्च शम्याकैश्चैव भारत |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
शमीमभिमुखं यान्तं रथमारोप्य चोत्तरम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
शमे चेद्याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् |
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
शमे धृतान्पुनः पार्थान्कोपय़ेत्को नु भारत ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
शमे निविष्टं विद्वांसमध्यापकमनादृतम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
शमे प्रय़तमानं मां सर्वय़त्नेन माधव ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
शमे प्रय़तमानस्य तव सौभ्रात्रकाङ्क्षिणः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शमे प्रय़तमानस्य मम शासनकाङ्क्षिणाम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
शमे शर्म भवेत्तात सर्वस्य जगतस्तथा ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
शमे हि सुमहानर्थस्तव पार्थस्य चोभय़ोः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
शमेन तपसा चैव भक्त्या च निरुपस्कृतः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
शमेन धर्मेण च रञ्जिताः प्रजा; स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
शमेन धर्मेण परस्य वुद्ध्या; जाता वुद्धिः सास्तु ते मा प्रतीपा |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
शमो दमस्तपो दानं सत्यं शौचमथार्जवम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शमो मे रोचते नित्यं पार्थैस्तात न विग्रहः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
शमो वहुविधाकारः सूक्ष्म उक्तः पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
शमो व्याय़ामय़ोगश्च योगो द्रव्यस्य सञ्चय़ः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
शम्भुमग्निमथ प्राहुर्व्राह्मणा वेदपारगाः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
शम्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं संनतिमेव च |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
शम्याकेन पुरा मह्यं तस्मात्त्यागः परो मतः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
शम्याकेन विमुक्तेन गीतं शान्तिगतेन ह ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
शक्र उवाच
शम्याक्षेपेण विधिना तदासीत्किं नु ते हृदि ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
शम्याक्षेपैरय़जं यच्च देवा; न्सद्यस्कानामय़ुतैश्चापि यत्तत् |
२७ क