वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
सार्करश्मितडिच्चक्रं सवलाकमिवाम्वुदम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रा द्यौश्च व्यक्तं व्यघूर्णत ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रां द्यां कुर्युर्ये महीतले ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
सार्थगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन ||
११७ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ||
१२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
६१
सार्थवाह उवाच
सार्थोऽय़ं चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यवादिनः |
१२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
सार्द्रचर्मणि भुञ्जीत निरीक्षन्वारुणीं दिशम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
सार्धं कथय़तो राज्ञः सा व्यतीय़ाय़ शर्वरी ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
सार्धं देवगणैः सर्वैर्वाचं तामन्वमोदत |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
सार्धं देवगणैः सर्वैर्वृहस्पतिपुरोगमैः ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
सार्धं पाञ्चालपुत्र्या त्वं राजानमुपजग्मिवान् |
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
सार्धं स माद्रीसुतभीमसेनै; र्भीष्मं यय़ौ शान्तनवं रणाय़ ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
सार्वकामिकमक्षय़्यं पितॄंस्तस्योपतिष्ठति ||
४४ ग
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सार्वभौमः खलु जित्वाजहार कैकेय़ीं सुनन्दां नाम |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
सार्वभौमस्य कौन्तेय़ यय़ातेरमितौजसः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सार्वैः सहैभिर्दुष्टात्मा वध्य एष प्रय़त्नतः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
सावज्ञमथ वामेन स्मय़ञ्जग्राह पाणिना |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
उमो उवाच
सावद्यं किं नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
सावरुह्य विमानाग्रादङ्गनानामनुत्तमा |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
पराशर उवाच
सावर्णस्य मनोः सर्गे सप्तर्षिश्च भविष्यति ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत्कृते युगे |
७० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
सावर्तमाना पतिता पृथिव्या; मुत्थाय़ दीना पुनरेव चैषा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
सावशेषाय़ुषं चापि कश्चिदेवापकर्षति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सावित्रं तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
सावित्रश्च जय़न्तश्च पिनाकी चापराजितः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
सावित्री कुण्डले दिव्ये शरीरं जनमेजय़ः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्री चापि दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्री तत उत्थाय़ केशान्संय़म्य भामिनी |
१०० क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्री त्वाह भर्तारं नैकस्त्वं गन्तुमर्हसि |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
अश्वपतिरु उवाच
सावित्री नाम राजर्षे कन्येय़ं मम शोभना |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
सावित्री प्रसवित्री च जीवविश्वासिनी तथा ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
सावित्री व्रह्मणः साध्वी कौशिकस्य शची सती |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सावित्री व्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सराः क्षपाः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
सावित्री सर्वविद्यानां देवतानां प्रजापतिः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
सावित्रीज्ञाः क्रिय़ावन्तस्ते राजन्केतनक्षमाः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्रीत्येव नामास्याश्चक्रुर्विप्रास्तथा पिता ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
सावित्रीमप्यधीय़ानः शुचौ देशे मिताशनः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्रीसहितोऽभ्येति सत्यवानित्यधावताम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च |
६० क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्र्या प्रीतय़ा दत्ता सावित्र्या हुतय़ा ह्यपि |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय़ श्रुतं ते वचनं शुभम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्र्यास्तु शय़ानाय़ास्तिष्ठन्त्याश्च दिवानिशम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सावित्र्यौद्दालकीय़ं च वैन्योपाख्यानमेव च |
१२६ क