उद्योग पर्व
अध्याय
१२
वृहस्पतिरु उवाच
अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं व्रह्मणा श्रूय़तामिदम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अस्मिंश्चेदागते काले कार्यं न प्रतिपद्यसे |
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिंश्चेदागते काले कालो वोऽतिक्रमिष्यति |
७५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
भीम उवाच
अस्मिंश्चेदागते काले श्रेय़ो न प्रतिपत्स्यसे |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिंस्तीर्थे महानद्या अद्यप्रभृति मानवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
अस्मिंस्तु खलु सङ्ग्रामे ग्राह्यं विविधमाय़ुधम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिंस्तु लोके नचिरान्मर्यादेय़ं शुचिस्मिते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत; दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिंस्तु वै सुसंवृत्ते दुर्लभे परमप्रिय़े |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अस्मिंस्तोय़ह्रदे सुप्तं जीवन्तं भृशविक्षतम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
अस्मिंस्त्वतिक्रमे व्रह्मन्क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
अस्मिञ्जने करिष्यन्ति प्रतिकूलानि कर्हिचित् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अस्मिञ्जिते जितं मन्ये पाण्डवेय़ं महावलम् ||
४५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिञ्ज्ञातिसमुद्धर्षे जय़मम्वा व्रवीतु मे ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अस्मिञ्शवं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
अस्मिन्कर्मणि निष्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्कलिय़ुगेऽप्यस्ति पुनः कौतूहलं मम |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्कार्ये द्विजश्रेष्ठा नक्षत्रे दिवसे शुभे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
अस्मिन्काले यदिष्टं ते व्रूहि किं करवाणि ते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
अस्मिन्किल स्वय़ं राजन्निष्टवान्वै प्रजापतिः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अस्मिन्कुरुक्षय़े वृत्ते दिष्ट्या त्वं पुत्र जीवसि ||
८४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्क्रतौ यथोक्तानि यज्ञाङ्गानि द्विजातिभिः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्खलु महाभागे शुभे तीर्थवरे पुरा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
अस्मिन्गच्छन्ति विलय़मस्माच्च प्रभवन्त्युत ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्गृहीते वरदे ऋषभे सर्वसात्वताम् |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
व्यास उवाच
अस्मिन्धर्मे विप्रलम्भे लोकवेदविरोधके |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अस्मिन्धर्मे सत्यवन्तं पर्यपृच्छन्त वै जनाः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
अस्मिन्धर्मे सर्वधर्माः प्रविष्टा; स्तस्माद्धर्मं श्रेष्ठमिमं वदन्ति ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्षः स्थितो ज्वलन् |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
अस्मिन्नन्तर्हितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्नभ्यागते काले किं च नः क्षममच्युत |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्नरण्ये नृपते मान्धातुरपि चात्मजः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
युधिष्ठिर उवाच
अस्मिन्नर्थान्तरे युक्तमनर्थः प्रतिपद्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निवोधोशनसा कृते ||
१८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
अस्मिन्नर्थे च यौ श्लोकौ गीतावङ्गिरसा स्वय़म् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
अस्मिन्नर्थे पुरा गीतौ श्रूय़ेते धर्मचिन्तकैः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
अस्मिन्नर्थे महाराज तन्मे निगदतः शृणु ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
अस्मिन्नर्थे वहुविधा शान्तिरुक्ता त्वय़ानघ |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
अस्मिन्नहं द्रुमे जातः साधुभिश्च गुणैर्युतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अस्मिन्निलय़ एव त्वं न्यग्रोधादवतारितः |
१४२ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
अस्मिन्नृषभकूटेऽभूदृषभो नाम तापसः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
अस्मिन्नेव प्रकरणे सुक्रतुर्वाक्यमव्रवीत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अस्मिन्नेव युगे तात विप्रैः सर्वार्थदर्शिभिः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषय़िष्ये कलेवरम् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अस्मिन्नेव वने कृष्णो हृतां कृष्णामवाजय़त् ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
अस्मिन्नेवं मतिद्वैधे मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
अस्मिन्नेवं सूक्ष्मगम्ये मार्गे सद्भिर्निषेविते |
२१ क