वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिष्यते ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरेष्वस्खलन्नन्या न्यपतंश्चापरा भुवि ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
शरीरैः शस्त्रभिन्नैश्च समास्तीर्यत मेदिनी ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरैः सम्प्रदीप्तैश्च देहवन्त इवाग्नय़ः |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरैरशिरस्कैश्च विदेहैश्च शिरोगणैः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
शरीरैर्वहुधा भिन्नैः शोणितौघपरिप्लुतैः |
३८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरैर्वहुसाहस्रैर्विनिकीर्णं समन्ततः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
शरीरय़ात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शरेण कार्तस्वरभूषितेन; दिवाकराभेन सुसंशितेन |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
शरेण घोरेण पुनश्च पाण्डवं; विभिद्य कर्णोऽभ्यनदज्जहास च ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
शरेण भृशतीक्ष्णेन पातय़ामास सारथिम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
शरेणाभ्यहनद्गाढं विकृष्य वलवद्धनुः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शरेणैकेन गोविन्द महादेवेन लीलय़ा ||
१२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
शरैः कदम्वकीकृत्य काले तस्मिंश्च पाण्डवः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शरैः कनकपुङ्खैश्च शक्तितोमरकम्पनैः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
शरैः कनकपुङ्खैस्तु चिता रेजुर्गजोत्तमाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
शरैः कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संय़ुगे ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शरैः पञ्चाशता चैनमविध्यत्कोपय़न्भृशम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
शरैः पञ्चाशता द्रोणो वारय़ामास संय़ुगे ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
शरैः पञ्चाशता राजन्क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
शरैः पञ्चाशता वीरः फल्गुनं प्रत्यविध्यत |
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
शरैः प्रचिच्छेद च पाण्डवस्त्वर; न्पराभिनद्वक्षसि च त्रिभिस्त्रिभिः ||
५६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
शरैः प्रचिच्छेद तवात्मजस्य; ध्वजं धनुश्च प्रचकर्त नर्दतः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
शरैः प्रच्छाद्य निधनमनय़त्परुषास्त्रवित् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
शरैः प्रच्छादय़ामास धृष्टद्युम्नममर्षणम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
शरैः प्रच्छादय़ामास मेरुं गिरिमिवाम्वुदः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
शरैः प्रच्छादय़ामास सारथिं चाप्यपातय़त् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शरैः प्रणुन्नं वहुधा पाण्डवैर्जितकाशिभिः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
शरैः शरांस्ततो द्रौणिः संवार्य युधि पाण्डवम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
शरैः शरीरान्तकरैः सुतेजनै; र्निजघ्नतुस्तावितरेतरं भृशम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
शरैः शरीरे वहुधा समर्पितै; र्विभाति कर्णः समरे विशां पते |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
शरैः संमोहिताश्चान्ये तमेवाभिमुखा यय़ौ |
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
शरैः संवार्य तान्वीरान्निजघान वलं तव ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शरैः सङ्कृत्तवर्माणं वीरं विशसने हतम् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
शरैः सञ्छादय़ामास भीष्मः परपुरञ्जय़ः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
शरैः सञ्छादय़ामास मेघैरिव दिवाकरम् ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शरैः सञ्छादय़ामास समन्तात्पाण्डुनन्दनम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
शरैः सञ्छादय़ामास सूतपुत्रस्य पश्यतः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
शरैः सन्ताड्यमानानां कवचानां महात्मनाम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
शरैः समन्ततः सर्वं खाण्डवं चापि पाण्डवः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
शरैः समर्पिता नागाः क्रौञ्चवद्व्यनदन्मुहुः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
शरैः सम्पीड्यमानाश्च नातिव्यक्तमिवाव्रुवन् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शरैः सम्प्रेषय़ामासुः परलोकाय़ भारत ||
५ ख