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वन पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
विसृज्यमानाः सुभृशं न त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालय़त्सु दिशो दश ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
विसृतं कालनानात्वमनादिनिधनं च यत् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
विसृष्टं भगदत्तेन तदस्त्रं सर्वघातकम् |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टं हि मय़ा दिव्यमेतदस्त्रं दुरासदम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विसृष्टः पाण्डवो राजन्सूतपुत्रेण धन्विना |
९६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
व्यास उवाच
विसृष्टमर्जुनेनेदं पुनश्च प्रतिसंहृतम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टवन्तं रत्नानि दाशार्हमपराजितम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टस्य रणे तस्य परमास्त्रस्य सङ्ग्रहे |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
विसृष्टा पृथिवी सर्वा सह पुत्रैश्च तत्परैः ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टास्तास्तदा जग्मुः शीतांशुभवनं तदा |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टास्वथ नारीषु धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टेषु त्वय़ा राजन्पाण्डवेषु महात्मसु |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
विसोमा इव शर्वर्यो विपुष्पास्तरवो यथा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
विस्तरं कुरुवंशस्य गान्धार्या धर्मशीलताम् |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
विस्तरं कुरुवंशस्य श्रीमतः कथय़न्ति ते ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशं चैव भारत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत्प्रव्रवीमि ते ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
विस्तराः क्लेशसंय़ुक्ताः सङ्क्षेपास्तु सुखावहाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलव्धवान् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
जनमेजय़ उवाच
विस्तरेण च मे शंस भीमसेनपराक्रमम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेण तदाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यताम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेण प्रदानस्य ये गुणाः श्रुतिलक्षणाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
विस्तरेण प्रवक्ष्यामि तच्छृणु त्वमशेषतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
विस्तरेण महाराज किं भूय़ः प्रव्रवीमि ते ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेण महावाहो न हि तृप्यामि कथ्यताम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
विस्तरेण महावाहो निखिलेन शुचिस्मिता |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेण महावाहो परं कौतूहलं हि मे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
विस्तरेण महावाहो शृणु तच्च विशां पते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
विस्तरेण महीपाल सङ्क्षेपेण पुनः शृणु ||
१९४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
विस्तरेण मुने व्रूहि विचित्राणीह भाषसे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
विस्तरेण मय़ाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
विस्तरेण यथावुद्धि कीर्त्यमानानि भारत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
विस्तरेण हि धर्माणां न जात्वन्तमवाप्नुय़ात् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
अर्जुन उवाच
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
विस्तरेणार्थसम्पन्नो यथास्थूलमुदाहृतः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणार्थसम्वन्धं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वय़ा द्विज |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
विस्तरेणैव पप्रच्छुः कथां तां पुरुषर्षभाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
धृतराष्ट्र उवाच
विस्तरेणैव मे शंस सर्वं गावल्गणे पुनः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
विस्तरैश्च समासैश्च धार्यते यद्द्विजातिभिः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
विस्तारः स्थावरः स्थाणुः प्रमाणं वीजमव्ययम् |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
विस्ताराय़ामसम्पन्नं यत्तत्र सलिले क्षमम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
विस्ताराय़ामसम्पन्ना भूय़सी चापि पाण्डव ||
२ ख