वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
त्वष्ट्रा तथोक्तः स पुरन्दरस्तु; वज्रं प्रहृष्टः प्रय़तोऽभ्यगृह्णात् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षाय़ुतशतं तदा |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
त्वष्ट्रा प्रय़त्नान्निय़मेन कॢप्तां; व्रह्मद्विषामन्तकरीममोघाम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वष्ट्रेव विहितं यन्त्रं यथा स्थापय़ितुर्वशे |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां क्रोधवशमापन्नं विदित्वा भरतर्षभ |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां च जानाम्यहं वीर पुराणमृषिसत्तमम् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वां च प्राप्य रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनङ्क्ष्यति |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
त्वां च मूढाकृतप्रज्ञमतिमानिनमाहवे |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां चापि श्रेय़सा योक्ष्ये नचिराद्भरतर्षभ |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
त्वां चाप्यद्य वधिष्यामि सपुत्रपशुवान्धवम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
त्वां चेच्छ्रुत्वा तात तथा चरन्त; मवभोत्स्यन्ते भारतानां चराः स्म |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां चेदवध्यमाय़ान्तमतीव प्रिय़दर्शनम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
त्वां चेदसौ याजय़ेद्वै वृहस्पति; र्नूनं स्वर्गं त्वं जय़ेः कीर्तिय़ुक्तः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
त्वां चेद्व्यसनमभ्यागादिदं भारत दुःसहम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
त्वां चैवाहं वधिष्यामि पापं पापस्य कारणम् ||
५७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
त्वां तु कापुरुषं पापं विदुः सर्वे मनीषिणः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
त्वां तु चक्षुर्हणं प्राप्य दग्धो घोरेण चक्षुषा ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्तास्मि वसुधामिमाम् ||
५४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां तु शोकेन सन्तप्तं मुह्यमानं मुहुर्मुहुः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
त्वां दिदृक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
त्वां दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्र सीदे वर्षास्विवाम्वुजम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित्त्वमसि मानुषी ||
११३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
त्वां निगृह्याहवे राजन्धार्तराष्ट्रो यमिच्छति |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोय़ं यथाविधि ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
त्वां निय़ोक्ष्यामहे कार्ये तद्भवान्कर्तुमर्हति |
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां पुरस्कृत्य सगणं वय़ं योत्स्यामहे परान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां प्रपन्नाय़ भक्ताय़ गतिमिष्टां जिगीषवे |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्र गृध्रः प्राप्येव वाय़सम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
त्वां प्राप्य वैरपुरुषं कुरूणामनय़ो महान् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्वां प्राप्य समरे वीरं ये गताः परमां गतिम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
त्वां भक्ता ये हृषीकेश दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
त्वां रक्षति सदा येन वनेऽस्मिन्पवनो ध्रुवम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
त्वां राजन्ननुगच्छामो ज्येष्ठोऽय़मिति भारत ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
भीमसेन उवाच
त्वां राजन्राजपुत्रीं च यमौ च पुरुषर्षभौ |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे; नालं प्रसोढुं वलहापि शक्रः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
त्वां विदित्वात्मदेहस्थं दुर्विदं दैवतैरपि |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
त्वां वुद्ध्वा व्राह्मणो विद्वान्न प्रमोहं निगच्छति |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां वै शत्रुं समासाद्य विनष्टा रणमूर्धनि ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
त्वां वय़ं समुपाश्रित्य संय़ुगे शत्रुसूदन |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
त्वां संरक्षेत पवनः सखित्वेन न संशय़ः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां सदैव महीपाल स त्वां श्रेय़सि योक्ष्यति ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
त्वां समाश्रित्य दुर्धर्षं तन्मे कर्तुं त्वमर्हसि ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां समासाद्य दुर्धर्षं पाण्डवाश्च व्यवस्थिताः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां समासाद्य निधनं गताः साश्वरथद्विपाः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
त्वां समाह्वय़ते वीर गोविन्दवरदर्पितः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
त्वां हि चक्षुर्हणं वीरं कोपय़ित्वा सुय़ोधनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ||
३४ ख