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आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
शव्द आसीन्महांस्तत्र दिवस्पृक्कीर्तिवर्धनः ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
शव्द एकमतैरेष व्याहृतः परमर्षिभिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
शव्दं गाण्डीवघोषेण कौन्तेय़ोऽभ्यभवद्वली ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
शव्दं च घोरं सत्त्वानां दावाग्नेरिव वर्धतः ||
२४ ग
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
शव्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
शव्दं न विन्देच्छ्रोत्रेण स्पर्शं त्वचा न वेदय़ेत् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
शव्दं सोढुं न शक्ष्यन्ति त्वामृते वीर पार्थिवाः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
शव्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
शव्दं स्पर्शं तथा रूपं रसं गन्धं च पञ्चमम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
शव्दं स्पर्शं तथा रूपं रसं गन्धं तथैव च ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
शव्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान्वहून् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
शव्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रय़माकाशसम्भवम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
शव्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रय़माकाशय़ोनिजम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
शव्दः समभवद्घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
शव्दः समभवद्राजन्दिविस्पृग्भरतर्षभ |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
शव्दः समभवद्राजन्नद्रीणामिव दीर्यताम् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
शव्दः सुतुमुलः सङ्ख्ये शराणां पततामभूत् |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
शव्दः सुतुमुलो घोरो मुहूर्तं समपद्यत ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रय़ः |
६ ख
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रय़ः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापां गुणाः स्मृताः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च मूर्त्यथ |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
शव्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
शव्दः स्पर्शश्च वाय़ोस्तु आकाशे शव्द एव च ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
शव्दः स्पर्शश्च वाय़ौ तु शव्द आकाश एव च ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
शव्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
शव्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसश्चापां गुणाः स्मृताः |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
शव्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
शव्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः |
४० क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
शव्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
शव्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रिय़ाणि च |
९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
शव्दः स्पर्शोऽथ रूपं च रसो गन्धस्तथैव च |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
शव्दप्रभवमन्विच्छंश्चचार कदलीवनम् ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
शव्दमभ्यद्रवच्चान्यः शव्दादन्योऽद्रवद्भृशम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
शव्दरागाच्छ्रोत्रमस्य जाय़ते भावितात्मनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
शव्दरूपरसस्पर्शगन्धाश्चाविष्कृताः शुभाः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
शव्दरूपरसस्पर्शान्सह गन्धेन केवलान् |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
शव्दरूपरसस्पर्शैर्गन्धैश्च विविधैरपि |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
शव्दलक्षणमाकाशं वाय़ुस्तु स्पर्शलक्षणः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
शव्दवन्तोऽनुधावेय़ुः कुर्वन्तो भैरवं रवम् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
शव्दवेध्यमुपाश्रित्य वहुरूपो धनञ्जय़ः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
शव्दव्रह्मणि निष्णातं परे च कृतनिश्चय़म् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
शव्दव्रह्मणि निष्णातः परं व्रह्माधिगच्छति ||
६० ख