द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
स रथं प्राप्य तं भ्रातुर्दुर्योधनहय़ाञ्शरैः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स रथः प्रद्रुतः सङ्ख्ये मण्डलानि सहस्रशः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
स रथः प्रय़यौ शत्रूञ्श्वेताश्वः शल्यसारथिः |
७३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स रथः सर्वतो भाति चित्रपुङ्खैः शितैः शरैः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स रथस्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रं समन्ततः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
स रथस्तव पुत्रस्य त्वरय़ा परय़ा युतः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स रथांस्त्रिशतान्हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् |
८० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
स रथादवतीर्याशु राजा परमकोपनः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स रथानीकवान्व्यूहो हस्त्यङ्गोत्तमशीर्षवान् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स रथे रथिनां श्रेष्ठः काञ्चने काञ्चनावृतः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स रथेन चरन्पार्थः प्रेक्षणीय़ो धनञ्जय़ः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
स रथेन चरन्मार्गान्धनुरभ्रामय़द्भृशम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स रथेऽतिरथस्तिष्ठन्रथशक्तिं परामृशत् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स रथोपस्थमासाद्य मुहूर्तं संन्यषीदत ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स रराज तथा सङ्ख्ये दर्शनीय़ो नरोत्तमः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स रवस्तस्य शूरस्य धर्मराजस्य भारत |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
स रश्मिभिरिवादित्यः प्रतपन्समरे वली |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
स रश्मिभिरिवादित्यः शरैररिनिघातिभिः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स राक्षसानुरगांश्चावजित्य; सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
स राक्षसेन्द्रं कौन्तेय़ः शरवर्षैरवाकिरत् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स राजकानां सर्वेषां पश्यतां वः किरीटिना ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
स राजगृद्धिभी रुद्धः पाण्डुपाञ्चालकेकय़ैः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स राजगृहमासाद्य कुवेरभवनोपमम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स राजतो महास्कन्धस्तालो हेमविभूषितः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
स राजधानीं सम्प्राप्य कौन्तेय़ोऽर्जुनमव्रवीत् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
स राजधान्या निर्याय़ वैराटिः पृथिवीञ्जय़ः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स राजन्न प्रजानाति दिशं काञ्चन मोहितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
स राजन्नाश्रमः ख्यातो भृगुतुङ्गो महागिरिः ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स राजन्प्रीय़माणेन मय़ाप्युक्तः कृताञ्जलिः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
स राजन्मानसं दुःखमपनीय़ युधिष्ठिरात् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
स राजन्मोक्ष्यसे पापात्तेन पूर्वेण हेतुना |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
स राजपुत्रो विशिरा विवाहु; र्विवाजिसूतो विधनुर्विकेतुः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स राजपुत्रोऽन्यदवाप्य कार्मुकं; वृकोदरं द्वादशभिः पराभिनत् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स राजमध्ये पुरुषप्रवीरो; रराज जाम्वूनदचित्रवर्मा |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स राजमार्गः शुशुभे समलङ्कृतचत्वरः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स राजमार्गमासाद्य समृद्धजनसङ्कुलम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
स राजराजो लङ्काय़ां निवसन्नरवाहनः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स राजसूय़ं राजेन्द्र कुरूणामृषभः क्रतुम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
स राजसूय़श्च समाप्तदक्षिणः; सभा च दिव्या भवतो ममौजसा ||
९४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स राजा कौशिकस्तात महाय़ोग्यभवत्किल |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
स राजा चक्रवर्त्यासीत्सार्वभौमः प्रतापवान् |
४७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
स राजा जाह्नवीकच्छे यथा ते कथितं मय़ा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
स राजा तस्य ते पुत्राः पितुर्दाय़ाद्यहारिणः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथार्हतः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
स राजा धर्मजो राजन्दीक्षितो विवभौ तदा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
स राजा धर्मनित्यः सन्सह पत्न्या महातपाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेष्ठो वै तेन कर्मणा |
२८ क