अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
२१८
स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजय़े रतः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रिय़ं तव ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
शान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
शान्तविघ्नः सुखारम्भः प्रभूतधनधान्यवान् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
शान्तस्य जज्ञे सन्तानस्तस्मादासीत्स शन्तनुः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
शान्ता चैनं पर्यचरद्यथाव; त्खे रोहिणी सोममिवानुकूला ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
शान्तां स्नुषां चैव ददर्श तत्र; सौदामिनीमुच्चरन्तीं यथैव ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
शान्ताः संन्यासिनः सिद्धाः पूताः पुण्येन कर्मणा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
शान्तात्मानो जितक्रोधाः प्राप्नुवन्ति द्विजातय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
शान्ताय़ां दिशि शान्ताश्च प्रावदन्मृगपक्षिणः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
शान्तिं पराश्वस्य यथा स्थितोऽभू; रुत्सृज्य वाणांश्च धनुश्च चित्रम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भावः; स्थिरो मम व्रूहि गावल्गणे तान् ||
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
शान्तिं लव्धास्मि तेषां वा रणे गन्ता सलोकताम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
शान्तिं लव्धास्मि परमां हत्व राक्षसकण्टकम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
शान्तिः सा त्रिषु लोकेषु सिद्धानां भावितात्मनाम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
शान्तिकं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत् ||
१५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
शान्तिकर्म विशुद्धिश्च शुभा वुद्धिर्विमोचनम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुकीर्तनम् |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याताः शरतल्पिकाः |
१९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
शान्तिमिच्छन्नदीनात्मा संय़च्छेदिन्द्रिय़ाणि च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
शान्तिमिच्छन्नुभय़तो न योद्धव्यं तदा भवेत् |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
शान्तिरेवं भवेद्राजन्प्रीतिश्चैव परस्परम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
शान्तिर्नोऽस्तु महाप्राज्ञ ज्ञातिभिः सह सञ्जय़ ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
शान्तिव्यवसिता विप्राः शमो दम इति प्रभो ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
शान्तिहोमांश्च कुर्वीत सावित्राणि च कारय़ेत् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
पुरोहित उवाच
शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य माम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
शान्तिय़ज्ञरतो दान्तो व्रह्मय़ज्ञे स्थितो मुनिः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
शान्तीनामपि या शान्तिर्द्युतीनामपि या द्युतिः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे च पातिते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
शान्तो वुद्धो गोसहस्रस्य पुण्यं; संवत्सरेणाप्नुय़ात्पुण्यशीलः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
अर्जुन उवाच
शान्त्यर्थं भारतं व्रूय़ा यत्तद्वाच्यममित्रहन् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
शान्त्यर्थं मनसस्तात नैतद्वृद्धानुशासनम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
शान्त्यर्थं वामदेवं च शान्तिर्व्रह्म सनातनम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
शान्त्यर्थं सर्वय़ोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
शान्तय़े सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ||
९३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
शापं च कारणं चैव यक्ष्माणं च तथात्मनः ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
शौनक उवाच
शापं तं त्वथ विज्ञाय़ कृतवन्तो नु किं परम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
शापं प्राप्तोऽसि दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
शापकालमवाक्षिप्य शमकालमुदीरय़न् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
ऋषिरु उवाच
शापक्षय़ान्ते निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
शापजं भय़मुत्सृज्य जगामैव वलात्प्रिय़ाम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
शापदोषं च तं भर्तुः श्रुत्वा स्वां प्रकृतिं गता |
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
शापमेनं तु शुश्राव स्वय़मेव पितामहः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
शापश्च सुमहांस्तस्य दत्तः सुरगणैस्तदा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्पस्य कथय़ामि तत् ||
१२ ख