शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
शापस्यान्तो भवेद्व्रह्मन्नित्येवं तमथाव्रुवम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
शापाच्छक्रस्य कौन्तेय़ चितो धर्मोऽनशन्मम |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
शापादस्मि विनिर्मुक्तो घोरादद्य वृकोदर ||
४६ ग
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
शापानुग्रहणे शक्तान्देवैरपि गरीय़सः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
शापान्तार्थं महाराज स च प्रादात्कृपान्वितः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
शापाभिभूतेन भृशमत्र किं प्रतिभाति ते ||
१३ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
शापार्हः पृथिवीनाशे हेतुभूतः शपस्व माम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
शापेन योजय़ामेति तथास्त्विति च साव्रवीत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
शापो ह्ययं भवतोऽनुग्रहाय़; प्राप्तो मय़ा यत्र दृष्टो यमो मे |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
शामित्रं तौ महावीर्यौ सम्यक्तत्र करिष्यतः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
शाम्यत्यदग्ध्वा नृपते विना ह्येकतरक्षय़ात् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
शाम्येति मुहुरुक्तोऽसि न च शाम्यसि पार्थिव ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
शारदं कौमुदं मासं ततस्ते स्वर्गमाप्नुवन् ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
शारदस्येव मेघस्य गर्जितं निष्फलं हि ते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शारदाभ्रचय़प्रख्यं प्राच्यानामभवद्वलम् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
शारदाविव जीमूतौ व्यरोचेतां व्यवस्थितौ ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शारदी द्यौरिवाभाति ज्योतिर्भिरुपशोभिता ||
४९ ग
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धय़ा |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानय़ा ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
शारद्वतं कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव च ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतं च विंशत्या विद्ध्वा पार्थः समुन्नदत् ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतमहीमानं विविंशतिझषाकुलम् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतशरैर्ग्रस्तं क्लिश्यमानं महावलम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतश्चोत्तरधूर्महात्मा; महेष्वासो गौतमश्चित्रय़ोधी |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतस्ततो राजन्भीष्मस्य प्रमुखे स्थितम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतस्तु विंशत्या वासुदेवं समार्पय़त् |
७८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
शारद्वतस्य चिच्छेद पाण्डवः परवीरहा ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतस्य पार्थस्य द्रौणेर्वैकर्तनस्य च |
१५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
शारद्वतस्यावसथं स्म गत्वा; महारथस्यास्त्रविदां वरस्य |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शारद्वताय़ाप्रतिद्वन्द्विने च; योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ||
८४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
शारद्वतीं ततो द्रोणः कृपीं भार्यामविन्दत ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतीसुतो राजन्नर्जुनं प्रत्यवारय़त् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतो गौतमश्चापि राज; न्महावलो वहुचित्रास्त्रय़ोधी |
९३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शारद्वतो महातेजा दिव्यास्त्रविदुदारधीः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शारीरमानसे दुःखे योऽतीते अनुशोचति |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
शारीरा मानसाश्चापि वेदना भृशदारुणाः ||
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
शारीरा मानसाश्चैव मर्त्यानां ये तु व्याधय़ः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शारीराज्जाय़ते व्याधिर्मानसो नात्र संशय़ः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
शारीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदय़ते रुजम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
शारीरैर्निय़मैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तपः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
शारीरैर्मानसैर्दुःखैः सुखैश्चाप्यसुखोदय़ैः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शार्ङ्गं तु वैष्णवं प्राहुर्दिव्यं तेजोमय़ं धनुः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
शार्ङ्गगाण्डीवधन्वानौ सहितावपराजितौ |
१६ क