chevron_left  शिखण्डीarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डी सर्वसैन्यानामग्र आसीद्विशां पते ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशां पते |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
शिखण्डी सह युष्माभिर्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डी सहदेवश्च नकुलो नाकुलिस्तथा |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शिखण्ड्यपि ततो राजन्द्रोणपुत्रमताडय़त् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शिखण्ड्यपि महाराज द्रौणिमासाद्य संय़ुगे |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
शिखण्ड्यपि महाराज पुंवद्राजकुले तदा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
अर्जुन उवाच
शिखण्ड्यपि युधां श्रेष्ठो भीष्ममेवाभिय़ास्यतु ||
९९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
शिखण्ड्यर्जुनभीमानां सात्वतस्य च भारत |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीप्तदर्शनम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
शिखरं वै महादेव्या गौर्यास्त्रैलोक्यविश्रुतम् |
१३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
शिखराणि व्यदीर्यन्त गिरीणां तत्र भारत |
३ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
शिखरे तं समासीनमधिपं सर्वरक्षसाम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शिखरैः काञ्चनमय़ैर्मेरुस्त्रिभिरिवोच्छ्रितैः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
शिखी जटी चीरवासाः पुनर्भवति पुत्रक |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
शिखी दण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो वली |
५६ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
शिखी सुकेशः परिधाय़ चान्यथा; भवस्व धन्वी कवची शरी तथा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सहस्रशः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
शितधारैस्तथा खड्गैर्विमलैश्च परश्वधैः |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
शितपीतानि शस्त्राणि संनाहाः पीतलोहिताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
शितशस्त्राय़ुधा रौद्राः कालरूपाः प्रहारिणः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
शिताग्रैः फल्गुनेनाजौ प्राक्षिराः प्रापतद्रथात् |
८१ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
शितिकण्ठं महाभागं प्रणिपत्य प्रसाद्य च |
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
शितिकण्ठमजं शक्रं क्रथं क्रतुहरं हरम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
शितिकण्ठमजं शुक्रं पृथुं पृथुहरं हरम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
शितिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलङ्कृतम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शितेन चैनं वाणेन प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ||
१२५ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
शितेन ते परशुना स्वय़मेवान्तको नृप |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शितेन दुर्योधनवाहुमुक्तं; क्षुरेण तत्तोमरमुन्ममाथ ||
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
शितेन रुक्मपुङ्खेन भल्लेन नतपर्वणा ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शितेनोरगसङ्काशां पत्रिणा विजहार ताम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शितैः पृषत्कैर्विददार चापि; महेन्द्रवज्रप्रतिमैः सुघोरैः ||
४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शितैः सुवहुशो राजंस्तं च विव्याध पत्रिभिः ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
शितैरग्निशिखाकारैर्द्रौणिं विव्याध चाष्टभिः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शितैरवाकिरन्वाणैः कलिङ्गानां वरूथिनीम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
शितैश्चितौ व्यरोचेतां कर्णिकारैरिवाचलौ ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
शिनिना सोमदत्तस्तु प्रसह्य भुवि पातितः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
शिनिवृषभशरप्रपीडितं; तव सुहृदो वसुषेणमभ्ययुः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
शिनेः पौत्रस्य तु रथं परिगृह्य महाद्विपः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
शिनेर्नप्ता किरन्वाणैरभ्यवर्तत सात्यकिः ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
शिनेर्नप्ता महावाहुरन्वपद्यत सात्यकिः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शिनेर्नप्तारं प्रवृणीम सात्यकिं; महावलं वीतभय़ं कृतास्त्रम् ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
शिनेर्नप्तारमासीनमभ्यभाषत सात्यकिम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
शिपिविष्ट इति ह्यस्माद्गुह्यनामधरो ह्यहम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
शिपिविष्टेति चाख्याय़ां हीनरोमा च यो भवेत् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
शिर उत्कृत्य तरसा पातय़ामास पाण्डवः ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
शिर उद्यम्य नागस्य पुनः पुनरवाक्षिपत् ||
१४ ख