द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
आत्मार्थं योधय़ रणे सात्यकिं सत्यविक्रमम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
आत्मार्थे सन्ततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनं तथा |
१७१ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
जरितारिरु उवाच
आत्मासि वाय़ोः पवनः शरीरमुत वीरुधाम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
आत्माहमपि सर्वस्य यच्च नास्ति यदस्ति च ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मीय़े च वरारोहे शय़नीय़े चतुर्दशीम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
आत्मेव वेदितव्येषु प्रिय़ेष्विव च जीवितम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
आत्मैव चात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
आत्मैव साक्षी किल लोककृत्ये; त्वमेव जानासि यदत्र दुष्टम् |
८३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
आत्मैव स्थानं मम जन्म चात्मा; वेदप्रोक्तोऽहमजरप्रतिष्ठः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
आत्मैव हि नलं वेत्ति या चास्य तदनन्तरा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आत्मैव ह्यात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
आत्मैव ह्यात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
आत्मैव ह्यात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
आत्मैवादौ निय़न्तव्यो दुष्कृतं संनिय़च्छता |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
आत्मोपमश्च भूतेषु यो वै भवति पूरुषः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
आत्मौपम्येन गन्तव्यं वुद्धिमद्भिर्महात्मभिः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
आत्मौपम्येन पुरुषः समाधिमधिगच्छति ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
आत्मय़ज्ञेन नृपते इष्ट्वा वैवस्वतं रणे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
आत्मय़ाजी सोऽऽत्मरतिरात्मक्रीडात्मसंश्रय़ः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
आत्मय़ोगसमाय़ुक्तो धर्मोऽय़ं कृतलक्षणः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
आत्मय़ोगाश्च तस्मिन्वै शास्त्रय़ोगाश्च शाश्वताः ||
८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
आत्मय़ोगेन भगवान्परिवर्तय़तेऽनिशम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
आत्मय़ोनिः स्वय़ञ्जातो वैखानः सामगाय़नः |
११९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
आत्मय़ोने महाभाग कल्पसङ्क्षेपतत्पर |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
आत्रेय़ः कुण्डजठरो द्विजः कुटिघटस्तथा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
आत्रेय़श्च वसिष्ठश्च कश्यपश्च महानृषिः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
आत्रेय़श्चन्द्रदमय़ोरर्हतोर्विविधं धनम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
आत्रेय़स्त्वथ कौण्डिन्यो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ||
१०२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
आत्रेय़स्य च संवादं साध्यानां चेति नः श्रुतम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
आत्रेय़ाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनय़ोषिकाः |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शक्र उवाच
आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः; स्नाय़ीत यः पुष्करमाददाति ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः; स्नाय़ीत यो वै हरते विसानि ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
आथर्वणेन मन्त्रेण सर्वा शान्तिः कृता भवेत् ||
८३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
आदत्त गाः सुशर्माथ घर्मपक्षस्य सप्तमीम् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
आदत्त परिघं घोरं द्रौणेश्चैनमवाक्षिपत् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
आदत्त पार्थोऽञ्जलिकं निषङ्गा; त्सहस्ररश्मेरिव रश्मिमुत्तमम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आदत्त महिषीं भोज्यां काम्यां सर्वाङ्गशोभनाम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
आदत्त सर्वभूतानि प्राप्ते काले यथान्तकः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
आदत्ते च रसं भौममादित्यः स्वगभस्तिभिः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
आदत्ते न च नो दृष्टोऽभागः पुरुषतः क्वचित् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो दिवि विद्वंस्ततस्ततः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
आदत्ते सततं मोहाद्यः स चिह्नं च मामकम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
आदत्तेऽर्थपरो वालो नानुवन्धमवेक्षते |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
आदत्तेऽसूञ्शरैः कर्णः पतङ्गानामिवानलः ||
९९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
आदत्स्व शिवमत्यन्तं योगक्षेमवदव्ययम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
आददत्सर्वलोकस्य प्राणानिव महारणे ||
३८ ख