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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं; तद्वेदिता संय़ुगं तत्र गत्वा ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
शक्यं ह्येवाहवे योद्धुं न दातुमनसूय़ितम् |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्यः केनचिदुद्यन्तुमतो विषममाचरम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
शक्यः प्राप्तुं जय़ोऽस्माभिर्देवैः स्कन्दमिवाजितम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वय़म् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
शक्यः समासादय़ितुं गोलोकः पुष्करेक्षण ||
४० ग
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
शक्यते दुस्त्यजेऽप्यर्थे चिररात्राय़ जीवितुम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
शक्यते परिसङ्ख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
शक्यते विधिना पापं यथोक्तेन व्यपोहितुम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्यन्ते मृदुना श्रेय़ः प्रतिपादय़ितुं तदा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
शक्यन्ते वशमानेतुं तथैव धनदेन च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्यमद्य त्वय़ा भर्तुं मोघस्तेऽय़ं परिश्रमः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
शक्यमाश्वासितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशां पते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
शक्यमेवं च भूय़श्च त्वय़ा वक्तुं यथेष्टतः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
शक्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारोऽप्यधिकस्त्वय़ा ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शक्यस्त्रासय़ितुं वाचा यथान्यः प्राकृतो नरः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
शक्या अश्वसहस्रेण वीरारोहेण भारत |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
शक्या गतिरिय़ं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्या चेय़ं शमय़ितुं त्वं चेदिच्छसि भारत |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
शक्या वहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वय़ानघ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
शक्या विषहता कर्तुं नक्लीवेन नृपात्मज ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
शक्याः साधय़ितुं तस्माद्विक्रमेणैव ताञ्जहि ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
शक्यो ग्रहीतुं सङ्ग्रामे देवैरपि युधिष्ठिरः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
शक्यो जीवय़ितुं ह्येष वालो वर्षशतैरपि ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च देवराट् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च संय़ुगे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
शक्यो द्रष्टुं स भगवान्प्रभामण्डलदुर्दृशः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
शक्यो वज्रधरो जेतुं वरुणोऽथ यमस्तथा |
६९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
शक्यो विजेतुं कौन्तेय़ो गोप्ता यस्य जनार्दनः ||
११७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
शक्यो विजेतुं सङ्ग्रामे राजन्मघवता अपि ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
शक्योऽमर्षो मनुष्येण कर्तुं पुरुषमानिना ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
शक्रं चाधिगमिष्यामि मा भैस्त्वं भद्रमस्तु ते ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
शक्रं जहीति चाप्युक्तो जगाम त्रिदिवं ततः ||
४४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
शक्रं मृगय़ शीघ्रं त्वं भक्ताय़ाः कुरु मे दय़ाम् ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शङ्करम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रः पाणौ गृहीत्वैनमुपावेशय़दन्तिके ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन्विचचार ह ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
शक्रः प्रह्रादमासीनमेकान्ते संय़तेन्द्रिय़म् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
शक्रः शचीपतिर्देवो यमो धूमोर्णय़ा सह |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
शक्रः सा हि मता तस्य रिपौ वृत्तिः सनातनी ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
शक्रः साक्षाद्वज्रपाणिर्यथेह; त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
शक्रगोपगणाकीर्णा प्रावृषीव यथा धरा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
शक्रतुल्यप्रभावानामिज्यया विक्रमेण च |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रतुल्यवलाः सर्वे यत्रावध्यन्त पार्थिवाः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
धृतराष्ट्र उवाच
शक्रतुल्यवलो युद्धे महेन्द्रो दानवेष्विव ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शक्रदेव इति ख्यातो जघ्नतुः पाण्डवं शरैः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शक्रदेवश्च कालिङ्गः कलिङ्गाश्च मृधे हताः ||
११२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शक्रदेवस्तु समरे विसृजन्साय़कान्वहून् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शक्रदेवाय़ चिक्षेप सर्वशैक्याय़सीं गदाम् ||
२१ ख