शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
धन्या धन्या इति जनाः सर्वेऽस्मान्प्रवदन्त्युत |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
धन्या वय़ं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
धन्या सा प्रमदा या त्वां पुत्रत्वे कल्पय़िष्यति |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
धन्यां चातीन्द्रिय़ज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
धन्याः पाण्डुसुता लोके येषां व्राह्मणपुङ्गवाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मो देवि धर्मपराय़णा |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
धन्यानामुत्तमं किं स्विद्धनानां किं स्विदुत्तमम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
धन्याश्च सर्व एवासन्व्रह्मंस्ते मम पूर्वकाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेय़मीदृशी |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मय़ा त्र्यम्वको हरः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
धृतराष्ट्र उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं च मे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यत्ते दृष्टः स्वय़ं प्रभुः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
धन्वन्तराय़ धनुषे धन्वाचार्याय़ धन्विने ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
धन्वन्तरेः प्रागुदीच्यां प्राच्यां शक्राय़ माधव |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
धन्विनः पुरुषाः केचित्संनिवार्य महारथान् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
धन्विनां नृपशार्दूल यः स सर्वास्त्रवित्तमः |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
धन्वी चरन्पार्थ पुरा मय़ैव; दृष्टो गिरेरृष्यमूकस्य सानौ ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद्भूमावतिष्ठत |
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
धनय़ुक्तास्त्वधर्मस्था दृश्यन्ते चापरे जनाः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
धमतां च महाशङ्खान्सङ्ग्रामे जितकाशिनाम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
धमन्तं वारिजं तात हेमजालविभूषितम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
धमन्ति कौरवाः शङ्खान्यस्य वीर्यमुपाश्रिताः ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
धमन्ति शङ्खाञ्शतशो हृष्टा घ्नन्ति च दुन्दुभीन् ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
धमन्तो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ||
६७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लल्प्स्यसे |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
धरणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
धरणीं नास्पृशच्चापि शरसङ्घैः समाचितः ||
८४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
धरणीं विविशुः सर्वे वल्मीकमिव पन्नगाः |
११८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
धरणीं समनुप्राप्तौ सर्वभूतनिषेविताम् |
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
धरणीमवतीर्याथ पूतात्मासौ तदाभवत् ||
२९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
धरण्यां निहतः शेते तन्ममाचक्ष्व केशव ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
धरण्यां पातय़िष्यामि प्रेक्षतस्ते महामुने ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
धरण्यां पार्थिवाः सर्वे अभ्यगच्छन्दिदृक्षवः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
धरण्यां मम पुत्रस्य पातय़िष्यति यः शिरः |
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
धरण्यां स नृपः शेते पापस्य मम कर्मभिः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
धरण्यामथ लीनाय़ामप्सु चैकार्णवे पुरा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
धरा विय़द्द्यौः प्रदिशो दिशश्च; छन्ना वाणैरभवन्घोररूपैः ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
अरुन्धत्यु उवाच
धरां धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम् |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
धराहरणदुर्गन्धो विषय़ः समपद्यत ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
धर्म इत्येव कुप्येत तथान्ये कुरुपुङ्गवाः ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
धर्म इत्येव ये यज्ञान्वितन्वन्ति निराशिषः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
धर्म इत्येव सन्तुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसंमताः ||
५८ ख