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कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तौ हत्वा समरे हन्ता त्वामद्धा सहवान्धवम् ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
तौ हि पूर्वं महाराज वारितौ कृतवर्मणा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ |
१०७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तौ हि शत्रून्महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे वहून् ||
३२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तौ हि सञ्जय़ दुःखार्तौ विज्ञाप्यौ वचनान्मम ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
तौ हृष्टरूपौ सम्प्रेक्ष्य कौरवेय़ाश्च सर्वशः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तौ ह्यप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रौ महारथौ |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
त्यक्तं मे जीवितं राजन्धनं राज्यं च पार्थिव |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भृगुरु उवाच
त्यक्तकामसुखारम्भस्तस्य स्वर्गो न दुर्लभः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तग्राम्यसुखाः पार्था नित्यं वीरसुखप्रिय़ाः |
९४ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
त्यक्तग्राम्यसुखाचारस्तप्यमानो महत्तपः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
त्यक्तदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी स मुच्यते ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
कर्ण उवाच
त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम् ||
८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
त्यक्तप्राणा जितस्वर्गा निवसन्ति महर्षय़ः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
त्यक्तमाना जितक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तवाक्यानृतस्तात शुभकल्याणमङ्गलः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १०६
युधिष्ठिर उवाच
त्यक्तवान्दुस्त्यजं वीरं तन्मे व्रूहि तपोधन ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
त्यक्तव्यः स दुराचारः सर्वेषामिति निश्चय़ः ||
२६ ग
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्रातं सर्वं मय़ैकय़ा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
त्यक्तश्रिय़ं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
त्यक्तस्य देवैरनय़ान्मृगय़ाय़ां दुरात्मनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
त्यक्तस्वधर्मा रक्ताङ्गास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
त्यक्तहिंसः शुभाचारो देवताद्विजपूजकः |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
त्यक्ता मातृपितृभ्यां ते न चाकम्पत जाजलिः ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्ता वय़ं तु भवता दुःखशोकपराय़णाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
त्यक्ता ह्येते मय़ा व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तात्मा पाण्डवार्थाय़ योत्स्यमानो व्यवस्थितः ||
४४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तात्मानं न वाधेत त्रिषु लोकेषु भारत |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
त्यक्तात्मानः पार्थिवाय़ोधनाय़; समादिष्टा धर्मराजेन वीराः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
त्यक्तात्मानः सर्व एते अन्त्यजा ह्यनिवर्तिनः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तात्मानः सह दुर्योधनेन; सृष्टा योद्धुं पाण्डवान्सर्वय़ोधाः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तारः संय़ुगे प्राणान्किं तेषामजितं युधि ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
त्यक्ताहाराः पवनपा दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
भीष्म उवाच
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता सता |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तुं न शेकुः स्नेहेन तथैव निधनं गताः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मय़मानोऽव्रवीदिदम् ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
त्यक्तैर्द्रव्यैर्यो भवति नोपय़ुङ्क्ते च कामतः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रोऽभ्यवासृजत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्णं प्रतिपद्यते |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
त्यक्तोपात्तं मद्यरतं द्यूतस्त्रीमृगय़ापरम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा कथं गच्छेथेमं पद्मलोलाय़ताक्षकम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय़ः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो व्रह्मत्वमश्नुते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
त्यक्त्वा गमिष्यथ क्वाद्य समुत्सृज्याल्पवुद्धिवत् ||
८८ ख