सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुपालस्तु तां पूजां वासुदेवे न चक्षमे ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुपालस्तु सङ्क्रुद्धे भीमसेने नराधिप |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
शिशुपालस्यापराधान्क्षमेथास्त्वं महावल ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
शिशुपालो जरासन्धो भीष्मको वक्र एव च |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुपालो महावीर्यः सह पुत्रेण भारत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
शिशुपालो महीपालस्तं वधिष्ये महीतले ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुभिर्दुर्जय़ैः सङ्ख्ये द्रौपदेय़ैर्महात्मभिः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुमारपुरं प्राप्य न्यविशंस्ते च पार्थिवाः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
शिशुरङ्के समारूढो न तत्प्राप निदर्शनम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
शिशुरेवाध्यगात्सर्वं स च व्रह्म सनातनम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
शिशुर्भूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परन्तप |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
शिशूनेतान्हतान्पश्य लक्ष्मणं च सुदर्शनम् |
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शिशून्कृतास्त्रानशिशुप्रकाशा; न्यदा द्रष्टा कौरवः पञ्च शूरान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
शिशोरालिङ्ग्यमानस्य स्पर्शः सूनोर्यथा सुखः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं वहु |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
शिश्नोदरे येऽभिरताः सदैव; स्तेना नरा वाक्परुषाश्च नित्यम् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
शिश्ये च शय़ने शुभ्रे तां रात्रिं भरतर्षभ ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
शिश्ये च शय़ने शुभ्रे वहुकृत्यं विचिन्तय़न् ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शिश्ये परमय़ा लक्ष्म्या वृतो व्राह्मणसत्तमैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
शिष्टं त्वत्र मनस्तात इन्द्रिय़ाणि च भारत |
९३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
शिष्टं दान्तं कृतज्ञं च प्रिय़ं च सततं मम |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
शिष्टं मात्सर्यहीनस्य वर्धत्यतिथिदर्शनात् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
शिष्टस्य दान्तस्य यतस्य चैव; भूतेषु नित्यं प्रिय़वादिनश्च ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
शिष्टा ते दमय़न्त्येका सर्वमन्यद्धृतं मय़ा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तय़े |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान्वक्ष्यामि शुचिव्रतान् |
२० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्टाः परिक्षितं त्वन्या मातरः पर्यवारय़न् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम |
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्मेष्वतन्द्रिताः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
शिष्टाचारः प्रिय़ो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचारगुणान्व्रह्मन्पुरस्कृत्य द्विजर्षभ ||
९४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
शिष्टाचारप्रवृत्ताश्च तान्नमस्याम्यहं सदा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
शिष्टाचारश्च शिष्टश्च धर्मो धर्मभृतां वर |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः ||
९० ग
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचारे भवेत्साधू रागः शुक्लेव वाससि ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचारे मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
युधिष्ठिर उवाच
शिष्टाचारो वहुविधो व्रूहि तन्मे पितामह ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
शिष्टाचीर्णं च धर्मं च त्रिविधं चिन्त्य चेतसा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
शिष्टाचीर्णः परः प्रोक्तस्त्रय़ो धर्माः सनातनाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शिष्टाचीर्णश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
शिष्टाञ्शिष्टाभिसम्वन्धान्मानिनो नावमानिनः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
शार्ङ्गका ऊचुः
शिष्टादिष्टः परित्यागः शरीरस्य हुताशनात् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
शिष्टानां क्षत्रिय़ाणां च धर्म एष सनातनः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
शिष्टानां हि मतं ग्राह्यं त्वद्विधैः शिष्टसंमतैः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
शिष्टानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
शिष्टाशिनः संविभज्याश्रितांश्च; मन्दाकिनीं तेऽपि विभूषय़न्ति ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
शिष्टाश्च वर्णाः पौरा ये ते हर्षाच्चुक्रुशुर्भृशम् ||
७३ ख