वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तो ह्येष सुरान्द्रष्टुं तपसा विक्रमेण च ||
२८ ग
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
शक्तोऽस्मि भरतश्रेष्ठ यत्नं कर्तुं यथावलम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाव्रवीत् ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
शक्तोऽहमपि शप्तुं त्वां मान्यास्तु व्राह्मणा मम |
५ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तोऽय़मित्यतो मत्वा मय़ा सम्प्रेषितोऽर्जुनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रुघ्नौ भीमविक्रमौ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यर्थं पृथिवीपाल कर्णं वाक्यमथाव्रवीत् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यस्त्रं भगवान्भीमं पुनः पुनरवासृजत् |
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यस्त्रस्य तु राजेन्द्र ततोऽर्चिर्भिः समन्ततः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
शक्त्या चैनमथाहत्य पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
शक्त्या जय़सि राज्ञोऽन्यानृषीन्धर्मोपसेवय़ा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पारिषदामपि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
शक्त्या पित्र्यं यच्च किञ्चित्प्रशस्तं; सर्वाण्यात्मार्थे मानवो यः करोति ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
शक्त्या रक्षो जहि कर्णाद्य तूर्णं; नश्यन्त्येते कुरवो धार्तराष्ट्राः ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
शक्त्या विभिन्नहृदय़ं विप्रविद्धाय़ुधध्वजम् |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्या विभेद भगवान्कार्त्तिकेय़ोऽग्निदत्तय़ा ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
शक्त्यां तु कम्पमानाय़ां विष्णुना वलिना तदा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा दम आर्जवम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा धर्मनित्यता |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
शक्त्यृष्टितोमरप्रासैर्गदानिस्त्रिंशसाय़कैः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यृष्टिपरशुप्रासैः करवालैश्च निर्मलैः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
शक्त्यृष्टिप्रासशव्दश्च तुमुलः समजाय़त |
७१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां वलानामभिगर्जताम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां सहदेवं जिघांसताम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यृष्टिमीनध्वजनागनक्रं; शरासनावर्तमहेषुफेनम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
शक्नुवन्ति प्रतिव्योढुमृते वुद्धिवलान्नराः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्नुय़ां यदि पन्थानमवतारय़ितुं पुनः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
शक्नुय़ां सैन्धवं हन्तुमनपेक्षो नरर्षभ ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
शक्नोति जीवितुं दक्षो नालसः सुखमेधते |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्षरीरविमोक्षणात् |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्नोत्युपावर्तय़ितुं कुन्तीं धर्मपरां सतीम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्यं किमन्यद्वक्तुं ते दानादन्यज्जनेश्वर |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
शक्यं चाल्पेन कालेन शान्तिं प्राप्तुं गुणार्थिना |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
भीष्म उवाच
शक्यं चेच्छ्रोतुमिच्छामि व्रूह्येतद्धर्मवित्तम ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
शक्यं तु मौण्ड्यमास्थाय़ विभ्रतात्मानमात्मना |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शक्यं त्वस्य धनुश्छेत्तुं ज्यां च वाणैः समाहितैः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
शक्यं त्वेकेन मुक्तेन कृतकृत्येन सर्वशः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
शक्यं दीर्घेण कालेन युक्तेनातन्द्रितेन च |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते वाय़ुर्द्रुममिवैकजम् ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
शक्यं निय़न्तुमभविष्यदात्मा; मन्युस्तु हन्ति पुरुषस्य धैर्यम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
शक्यं नृलोके संस्थातुं प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
शक्यं पुनररण्येषु सुखमेकेन जीवितुम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
शक्यं प्राप्तुं विशेषेण दानं हि महती क्रिय़ा ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
शक्यं वहुविधं वक्तुं भवतः कार्यदूषणम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शक्यं वहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
शक्यं वा यदि वाशक्यं करिष्यामि वचस्तव ||
२० ख