कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानः समरे शरैः परवलार्दनः |
९५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानः समरे हताश्वो हतसारथिः |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानः सहसा कर्णेन दृढधन्विना |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानो वहुभिस्तव पुत्रैर्महारथैः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स छिन्नधनुरादाय़ अथ शक्तिं प्रतापवान् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा त्वरितस्त्वराकाले नृपोत्तमः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा भीमेन धनञ्जय़शराहतः |
८४ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथः खड्गमादाय़ चर्म च |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथः शीर्णवर्मा शरार्दितः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालय़न् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालय़न् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः |
१३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा समरे विवर्मा च महारथः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नवर्मा नाराचैः प्रहारैर्जर्जरच्छविः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नो वहुधा राजन्सूतपुत्रेण मारिष |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स छिन्नय़ष्टिः सुमहाञ्शीर्यमाणः शराहतः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
अहल्यो उवाच
स जगाम ततः शीघ्रमुत्तङ्को व्राह्मणर्षभः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
स जगाम रथाद्भूमिं सहदेवेन पातितः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
वैशम्पाय़न उवाच
स जगौ परमं जप्यं नाराय़णमुदीरय़न् ||
१२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
स जज्ञे विदुरो नाम कृष्णद्वैपाय़नात्मजः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
स जज्ञे विश्रवा नाम तस्यात्मार्धेन वै द्विजः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
स जनः क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्रं विगर्हय़न् ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स जनमेजय़ एवमुक्तो देवशुन्या सरमय़ा दृढं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स जनमेजय़स्य भ्रातृभिरभिहतो रोरूय़माणो मातुः समीपमुपागच्छत् |
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स जलं पावको भूत्वा शोषय़त्यनिशं प्रभो ||
२१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स जले प्राक्षिपत्तत्तु तथाक्षय़्यौ महेषुधी ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
स जातमात्रान्पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
स जातमात्रो ववृधे समाः सद्यस्त्रय़ोदश |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
स जातमात्रो विनतां परित्यज्य खमाविशत् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
स जातमात्रो व्यनदद्यथैवोच्चैःश्रवा हय़ः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
स जानंस्तस्य चात्मानं मम चैव परं मतम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
स जाय़ते पुल्कसो वा चण्डालो वा कदाचन ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
स जाय़ते महाराज मूषको निरपत्रपः ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
स जाय़ते वभ्रुसमो दारुणो मूषको नरः ||
९४ ग
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
स जाय़मानो विगृहीतगात्रः; षड्ज्ञाननिष्ठाय़तनो मनुष्यः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स जितः पाण्डवैः शूरैः समर्थैर्वीर्यशालिभिः ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
स जित्वा समरे शत्रून्द्रोणपुत्रो महारथः |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशय़ः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
स जीवः परिसङ्ख्यातः शेषः सङ्कर्षणः प्रभुः |
३५ क