शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
शीतार्तश्च क्षुधार्तश्च पूजामस्मै प्रय़ोजय़ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
शीतार्तस्तद्वनं सर्वमाकुलेनान्तरात्मना ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शीतैस्तु सिषिचुस्तोय़ैर्विव्यजुर्व्यजनैरपि ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गो; न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानय़ोः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
शीतोष्णे चैव वाय़ुश्च गुणा राजञ्शरीरजाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शीतोष्णे चैव वाय़ुश्च त्रय़ः शारीरजा गुणाः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
शीतय़ोगवहो नित्यं स गच्छेत्परमां गतिम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
शीतय़ोगोऽग्निय़ोगश्च चर्तव्यो धर्मवुद्धिभिः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपय़ुक्तवान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
शीर्णं परशरीरेण निच्छवीकं शरीरिणम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शीर्णं पुराभवत्तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शीर्णदन्ता विरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डकाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
शीर्णनाभि यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
शीर्णपर्णेन चैकेन पारय़ामास चापरम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
शीर्णप्रवरय़ोधाद्य हतवाजिनरद्विपा |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शीर्यमाणा यथा दीप्ता गगनाद्वै शतह्रदा ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
शीर्यमाणान्यदृश्यन्त भिन्नान्यर्जुनसाय़कैः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
शीर्षं तस्याभवद्वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
शीर्षत्राणानि चैतानि पुत्राणां मे महीतले |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
शीर्षपाषाणसञ्छन्नाः केशशैवलशाद्वलाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
शीर्षरोगेऽक्षिरोगे च दन्तशूले गलग्रहे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतुः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
शीर्षोपलसमाकीर्णा हस्तिग्राहसमाकुला |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
शीर्षय़ोः पतिता वृक्षा विभिदुर्नैकधा तय़ोः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
शीलं जिज्ञासमानेन राज्ञश्च सहजीविना ||
५० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
शीलं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
शीलचारित्रगोत्रस्य धारणार्थं कुलस्य च ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
शीलदोषाद्घृणाविष्ट आनृशंस्यात्परन्तप |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
शीलदोषान्विनिर्हन्तुं स पिता स प्रजापतिः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशीकृतम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
श्रीरु उवाच
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशय़ः ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
शीलमेतदसाधूनामभ्रं पारिप्लवं यथा ||
३९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
शीलरश्मिसमाय़ुक्ते स्थितो यो मानसे रथे |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
राजो उवाच
शीलरूपगुणोपेतामिक्ष्वाकुकुलवृद्धय़े ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
शीलरूपरतास्त्वन्ये तथान्ये सिद्धसाध्ययोः |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
शीलवद्भिः कुलीनैश्च विद्वद्भिश्च युधिष्ठिर ||
१९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
शीलवन्तः कृतास्त्राश्च द्रक्ष्यथाद्य परस्परम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शीलवान्गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रिय़दर्शनः ||
१९१ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
शीलवान्सुसमाचारः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
शीलवृत्तमविज्ञाय़ धास्यामि विनय़ं परम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
शीलवृत्तान्विता साध्वी निय़ता न च मानिनी ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
शीलवृत्ते समाज्ञाय़ विद्यां योनिं च कर्म च |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
शीलवृत्तोपसम्पन्नो धर्मज्ञः सत्यसङ्गरः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
शीले स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं; ततस्ततश्चोपरमः क्रिय़ाभ्यः ||
३५ ख