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शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकचित्तग्रहे रतः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजाय़ते ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
शुचीनि श्रवणीय़ानि शृणोमीह धनञ्जय़ |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
शुचीन्भागान्प्रतिजगृहुश्च हृष्टाः; साक्षाद्देवा जनकस्येह यज्ञे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
शुचेरश्रद्दधानस्य श्रद्दधानस्य चाशुचेः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
शुचौ चाभ्यर्चिते देशे त्रिदशाः प्राय़शः स्थिताः |
८६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
शुचय़ः सक्तवश्चेमे निय़मोपार्जिताः प्रभो |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
शुचय़स्तीर्थभूतास्ते ये भैक्षमुपभुञ्जते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
शुद्धं जीवितमेवापि तादृशो वहु मन्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
शुद्धं हि दैवमेवेदमतो नैवास्ति पौरुषम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
शुद्धकेय़ूरकण्ठत्राः शुक्लमाल्याम्वरावृताः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
शुद्धदेहश्च संय़ाति शुभाँल्लोकाननुत्तमान् ||
३५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद्वेद्मि जनार्दनम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
शुद्धवाणहतानां च मृगाणां पिशितान्यपि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
शुद्धां गतिं तां परमां परैति; शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
शुद्धात्मा गुणवान्पार्थः सत्यवान्नीतिमाञ्शुचिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
शुद्धात्मा तपसा दान्तो निवृत्तद्वेषकामवान् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
शुद्धात्मा व्राह्मणो रात्रौ निदर्शनमपश्यत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शुद्धात्मानः शुद्धवृत्ता राजन्स्वर्गपुरस्कृताः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
शुद्धान्तं प्राविशं राजन्नाख्यातुं नरदेवय़ोः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
शुद्धान्दशभिरावर्तैः सिन्धुजान्वातरंहसः ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
शुद्धाश्च निर्वाणरताश्च देवाः; स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाश्च ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
शुद्धेन तव दानेन न्याय़ोपात्तेन यत्नतः |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः ||
७२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
शुद्धो जितेन्द्रिय़ो दान्तस्तस्याः शुद्धिः कृता मय़ा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
शुद्धो ह्यर्थो नावमन्यः स्वधर्मा; त्पात्रे देय़ं देशकालोपपन्ने |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
पर्वत उवाच
शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
शुनःसखश्च हत्वा तां यातुधानीं महावलाम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
शुनःसखसखाय़ं मां यातुधान्युपधारय़ ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
शुनःसखसहाय़ास्तु विसार्थं ते महर्षय़ः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
शुनको नाम राजर्षिः स वभूव नराधिपः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
शुनको नाम विप्रर्षिर्यस्य पुत्रोऽथ शौनकः ||
६२ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
इन्द्र उवाच
शुना दृष्टं क्रोधवशा हरन्ति; यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
शुनि श्वपाके वैणेय़े सचण्डाले सपुल्कसे ||
३१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
शुनीष्वपि विडालाश्च मूषका नकुलीषु च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
शुभं कर्म निराकारो वीतरागत्वमेव च ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
शुभं कर्म परित्यज्य योऽहं शकुनिलुव्धकः ||
३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
शुभं तीर्थवरं तस्माद्रामतीर्थं जगाम ह ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
शुभं दिव्यममर्त्यानाममृतस्याकरं परम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
शुभं देशमय़ाचन्त यजेम इति पार्थिव ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
शुभं वा यत्प्रकुर्वन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रिय़म् |
४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
शुभं वा यदि वा पापं भ्रातॄणां स्थानमद्य मे |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत् ||
१४ ख