शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वाय़ोपकल्पते |
१३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीय़ा मृषा वुधैः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
व्यास उवाच
शुभकृच्छुभय़ोनीषु पापकृत्पापय़ोनिषु |
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
शुभकृच्छुभय़ोनीषु पापकृत्पापय़ोनिषु ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
शुभदर्शनमेवासीन्नालभ्रष्टमिवाम्वुजम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
शुभमौर्वं नवं कृत्वा महापुरुषविग्रहम् |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत्प्रिय़दर्शनाः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
शुभस्कन्धो महेन्द्रश्च माल्यवान्पर्वतस्तथा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
शुभा तस्मात्स सुखितो न शोचति पितामह ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
शुभाः पर्याप्तसञ्चारा विद्यन्तेऽस्मिन्महावने ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशय़ः |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
शुभाङ्गदं नागय़ज्ञोपवीतिं; विश्वैर्गणैः शोभितं भूतसङ्घैः |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः |
९७ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
शुभाचारं शुभकथं सुस्थिरं तमलोलुपम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
शुभानामपि जानामि कृतानां कर्मणां फलम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसञ्चय़े |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसञ्चय़े |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
शुभानामशुभानां च कुरुते सञ्चय़ं महत् ||
२३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
शुभानुशय़योगेन मनुष्येषूपजाय़ते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
शुभानुशय़वुद्धिर्हि संय़ुक्तः कालधर्मणा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ||
८९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
शुभार्थेप्सुः शुभमतिर्यत्र राजा युधिष्ठिरः |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
शुभाशुभं कर्म कृतं यदस्य; तदेव प्रत्याददते स्वदेहे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
शुभाशुभं कर्म समीरितं य; त्प्रवर्तते सर्वलोकेषु किञ्चित् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
शुभाशुभं पुरुषः कर्म कृत्वा; प्रतीक्षते तस्य फलं स्म कर्ता |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च; विष्वक्सेनात्सर्वमेतत्प्रतीहि |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रिय़ः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
शुभाशुभफलं चेमे प्राप्नुवन्तीति मे मतिः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
शुभाशुभफलप्राप्तौ किमतः श्रोतुमिच्छसि ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मवन्धनैः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
शुभाशुभमिव स्फीता सर्वसस्यधरा धरा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
शुभाशुभमय़ं सर्वमेतदाहुः क्रिय़ापथम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शुभाशुभाधिवासेन संसर्गं कुरुते यथा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३
भीष्म उवाच
शुभाशुभान्याचरन्हि तस्य तस्याश्नुते फलम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शुभाशुभान्वितान्भावान्विसृजन्सङ्क्षिपन्नपि |
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
शुभाशुभास्तदा तत्र तस्य किं मानकारणम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकर्तुं वुद्धिलाघवात् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
शुभाशुभेषु सक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद्भय़म् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
शुभाशुभैः कर्मभिर्यो न लिप्यति कदाचन ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
शुभे त्वसौ तुष्यति दुष्कृते तु; न तुष्यते वै परमः शरीरी ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
नारद उवाच
शुभे देशे महाराज पुण्ये देवर्षिसेविते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
शुभे पात्रे ये गुणा गोप्रदाने; तावान्दोषो व्राह्मणस्वापहारे |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
शुभेन कर्मणा यद्वै तिर्यग्योनौ न मुह्यसे |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
शुभेन येन मोक्षं वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
शुभेन विचरँल्लोके शुभचारी भवत्युत ||
१४ ख