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शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
शुभेन विधिना लव्धमर्हाय़ प्रतिपादय़ेत् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
शुभैः कर्मफलैर्देवि मय़ैते परिकीर्तिताः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
शुभैः कर्मभिरारव्धाः प्रच्छिदन्त्यशुभेषु च ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
शुभैः पाण्डुजितै रत्नैस्तोषय़ामास भारत ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टान्हेमधातुविभूषितान् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
शुभैः प्रय़ोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
शुभैः शुभमवाप्नोति कृत्वाशुभमतोऽन्यथा ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
शुभैः संविभजन्कामैरशुभानां च पावनैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
शुभैर्लभति देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
शुभ्रवर्माम्वरधरः स्वङ्गदी चारुकुण्डली ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
शुभय़ोन्यन्तरगताः प्राय़शः शुभलक्षणाः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
शुल्कं तु सर्वधर्मज्ञ हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
शुल्कं ते कीर्तय़िष्यामि तच्छ्रुत्वा सम्प्रधार्यताम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
शुल्कं प्रदीय़तां मह्यं ततो वेत्स्यसि मे सुताम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
शुल्कमन्येन दत्तं स्याद्ददानीत्याह चापरः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
नाभाग उवाच
शुल्केन कन्यां ददतु यस्ते हरति पुष्करम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभाते च विमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले ||
४७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते तदा तौ तु शैनेय़कुरुपुङ्गवौ |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते नरव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते नरव्याघ्रौ भीष्मपार्थौ शरक्षतौ |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते नरव्याघ्रौ युद्धाय़ समवस्थितौ ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते महात्मानौ चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
शुशुभाते रणेऽतीव पटे चित्रगते इव ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिय़ा वृतः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे केतुना तेन राजतेन जय़द्रथः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे केतुमुख्येन पादपेन कलिङ्गपः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे केतुमुख्येन राजतेन जय़द्रथः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे चन्द्रमा युक्तो दीप्तैरिव महाग्रहैः ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे चय़नं तत्र दक्षस्येव प्रजापतेः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे ज्वलितोऽर्चिष्मान्द्वितीय़ इव पावकः |
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तत्पुरं चापि समुद्रौघनिभस्वनम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे तद्रणस्थानं शरदीव नभस्तलम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तारकाचित्रा द्यौश्चन्द्रेणेव भारत ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तारकाराजः सितमभ्रमिवास्थितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे तारकाराजसितमभ्रमिवाम्वरे ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे धनसम्पूर्णं धनाध्यक्षक्षय़ोपमम् ||
३६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे पाण्डवं सैन्यं तत्तदा भरतर्षभ ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे पाण्डवी सेना नक्षत्रैरिव शर्वरी ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे पुरुषव्याघ्रो महार्हशय़नोचितः ||
२० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे भरतश्रेष्ठ नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे भरतश्रेष्ठ वितानमिव विष्ठितम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे भरतश्रेष्ठो गिरिस्थ इव केसरी |
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे भारती दीप्ता दिवीवादित्यमण्डलम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
शुशुभे मेघमालाभिरादित्य इव संवृतः ||
८ ख