द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं प्रय़यौ यत्र फल्गुनः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं मार्गणैः क्षतविक्षतौ |
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य गुरुं मूर्ध्ना प्रय़यौ स्वं निवेशनम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
अभिवाद्य गुरुं व्रूय़ादधीष्व भगवन्निति |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य च गोविन्दः सात्यकिस्ते च कौरवाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अभिवाद्य च तं देवा दृष्ट्वा च यशसा वृतम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्यथिताननाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
अभिवाद्य च वक्तव्यस्ततोऽस्माकं पितामहः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
अभिवाद्य चैनं विधिवदव्रुवं वाक्यमुत्तमम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य ततः कृष्णं पाण्डवं च धनञ्जय़म् |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य ततः पादौ मातापित्रोर्विशां पते |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
अभिवाद्य ततः सा तं प्राक्रीडदृषिसंनिधौ |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य ततो भीष्मं निषण्णः परमासने |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालमरन्तुकम् |
१७१ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमव्रवीत् |
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य तु राजानं युय़ुधानाच्युतार्जुनाः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य त्वां पाण्डुपुत्रो मनस्वी; युधिष्ठिरः कुशलं चान्वपृच्छत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
अभिवाद्य नमस्कृत्य मातामहमथाव्रुवन् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य न्यवर्तन्त पृथां तामनिवर्त्य वै ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अभिवाद्य पुनर्योगमास्थाय़ाकाशमाविशत् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अभिवाद्य पूर्वं शिरसा तपोवृद्धं दृढव्रतम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य महात्मानं भीष्मं कुरुपितामहम् ||
८३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य महावाहुः सान्त्वपूर्वमिदं वचः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य महावाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
अभिवाद्य मातुर्भगिनीमिदं वचनमव्रवीत् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
महाभारत कथा
अभिवाद्य मुनींस्तांस्तु सर्वानेव कृताञ्जलिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
अभिवाद्य यथा वृद्धान्सन्तो गच्छन्ति निर्वृतिम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
अभिवाद्य यथान्याय़ं यथाज्येष्ठं नृपांश्च तान् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य विराटं च कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः कुरुभिः सह ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य स गान्धारीं तय़ा च प्रतिनन्दितः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
अभिवाद्य सुपर्णस्तु गालवश्चाभिपूज्य ताम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्य स्थिता राजन्रौहिणेय़ं महावलम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य स्वजेथाश्च पाण्डवान्परिकीर्तय़न् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
अभिवाद्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||
११२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्या तु सा कृष्ण त्वय़ा मद्वचनाद्विभो |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अभिवाद्या वै मद्वचनेन वृद्धा; स्तथेतरेषां कुशलं वदेथाः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्याग्रतः स्थित्वा सम्प्रहृष्टः कृताञ्जलिः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्याञ्जलिं वद्ध्वा वन्दमानोऽभ्यभाषत ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्याथ कौन्तेय़ः पितामहमरिन्दमम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्याथ तां कृष्णः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
अभिवाद्याथ रुद्राय़ सद्योऽन्धकनिपातिने |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्निय़ता स्थिता ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वैश्च प्रतिनन्दितः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
अभिवाद्याह्निकं कृत्वा शुचिः प्रय़तमानसः |
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अभिवाद्योपतस्थुर्वै क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभम् ||
२ ख