chevron_left  इन्द्रिय़ाणांarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाणां प्रसृष्टानां हय़ानामिव वर्त्मसु |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रिय़ाणां यमे यत्तो भव राजन्नतन्द्रितः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
इन्द्रिय़ाणां रजस्येव प्रभवप्रलय़ावुभौ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ाणां व्युपरमे मनोऽनुपरतं यदि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
इन्द्रिय़ाणां श्रमात्स्वप्नमाहुः सर्वगतं वुधाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
इन्द्रिय़ाणां समस्तानां चित्रा इव मनःक्रिय़ाः ||
२३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ाणां स्वकर्मभ्यः श्रमादुपरमो यदा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीय़ते |
६७ क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीय़ते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
इन्द्रिय़ाणां हि सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रिय़ाणामनीशत्वादसज्जनवुभूषकः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ाणामनीशत्वाद्राजानो राज्यविभ्रमैः ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ाणामनुत्सर्गो मृत्युना न विशिष्यते |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ाणामनैश्वर्यादैश्वर्याद्भ्रश्यते हि सः ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रिय़ाणामुदीर्णानां कामत्यागोऽप्रमादतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
शुक उवाच
इन्द्रिय़ाणि गुणाः केचित्कथं तानुपलक्षय़ेत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
इन्द्रिय़ाणि च पञ्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाणि च पञ्चैव रजः सत्त्वं तमस्तथा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ाणि च भावाश्च गुणाः सप्तदश स्मृताः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रिय़ाणि च सर्वाणि मनसि स्थापितानि ते ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ाणि च सर्वाणि वाजिवत्परिपालय़ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
इन्द्रिय़ाणि जघानाशु वाणेनैकेन वीर्यवान् |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणि जनाः पौरास्तदर्थं तु परा कृतिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २००
व्राह्मण उवाच
इन्द्रिय़ाणि तु यान्याहुः कानि तानि यतव्रत |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
इन्द्रिय़ाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारय़ेत् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रिय़गोचराः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
मन उवाच
इन्द्रिय़ाणि न भासन्ते मय़ा हीनानि नित्यशः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ाणि न वुध्यन्ते क्षेत्रज्ञस्तैस्तु वुध्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणि पराण्याहुरिन्द्रिय़ेभ्यः परं मनः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणि पृथक्त्वर्थान्मनसो दर्शय़न्त्युत ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणि प्रमाथीनि वुद्ध्या संय़म्य यत्नतः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ाणि प्रसक्तानि विषय़ेषु यथा रतिम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनश्चैव विज्ञानान्यस्य भारत |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनश्चैव वुद्धौ संवेशितानि ते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो युङ्क्ते वश्यान्यन्तेव वाजिनः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो वाय़ुः शोणितं मांसमस्थि च |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो वुद्धिं क्षेत्रज्ञो युञ्जते सदा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो वुद्धिः सत्त्वं तेजो वलं धृतिः |
१३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनो वुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ाणि महत्प्रेप्सुर्निय़च्छेदर्थधर्मय़ोः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाणि यदा देही धारय़न्निह तप्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि यशः कीर्तिमाय़ुश्चास्योपकृन्तति ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
इन्द्रिय़ाणि वशे कृत्वा पूर्णसागरसंनिभः ||
१६ ख