शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
शूद्राय़ैव विधेय़ानि तस्य धर्मधनं हि तत् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे चैतन्न विद्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
शूद्रेण च न हातव्यो भर्ता कस्याञ्चिदापदि |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
शूद्रेणार्थप्रधानेन नृशंसेनातताय़िना ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रय़ुज्येत वुद्धिमान् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
शूद्रो राजन्भवति व्रह्मवन्धु; र्दुश्चारित्र्यो यश्च धर्मादपेतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
शूद्रो वा यदि वाप्यन्यः सर्वथा मानमर्हति ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
शूद्रो वैश्यः क्षत्रिय़ो वा व्राह्मणो वापि शस्त्रभृत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रो व्राह्मणतां गच्छेद्वैश्यः क्षत्रिय़तां व्रजेत् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
शूद्रो ह्येनान्परिचरेदिति व्रह्मानुशासनम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रोऽपि द्विजवत्सेव्य इति व्रह्माव्रवीत्स्वय़म् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रोऽप्यागमसम्पन्नो द्विजो भवति संस्कृतः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तापसो भृशसंय़ुतः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
अणीमाण्डव्य उवाच
शूद्रय़ोनावतो धर्म मानुषः सम्भविष्यसि ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
शूद्रय़ोनावपि ततो वहुशः परिवर्तते ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
विदुर उवाच
शूद्रय़ोनावहं जातो नातोऽन्यद्वक्तुमुत्सहे |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
शूद्रय़ोनिमतिक्रम्य ये चान्ये तामसा गुणाः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
शूद्रय़ोनौ मय़ा हीमे जाताः काक्षीवदादय़ः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
ऋषिरु उवाच
शूद्रय़ोनौ वर्तमानो धर्मज्ञो भविता ह्यसि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
जनक उवाच
शूद्रय़ोनौ समुत्पन्ना विय़ोनौ च तथापरे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
शूद्रय़ोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
शून्यं मृगगणाकीर्णं कदलीवनशोभितम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
शून्यं येन जनाकीर्णं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
शून्यः शून्येन मनसा प्रपतिष्यन्महीतलम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
शून्यभूय़िष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
शून्यमावासय़न्त्या च मय़ा किं कस्य दूषितम् ||
१६८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
शून्यमासाद्य कुरवः प्रय़ान्त्यादाय़ गोधनम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
शून्यमासीज्जगत्सर्वं कालेनेव हतं यथा ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शून्यमाय़ोधनं कृत्वा शरवर्षैः समन्ततः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
शून्या गिरिगुहाश्चैव देवताय़तनानि च |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
शून्याः कृता रथोपस्था हताश्च गजवाजिनः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
शून्याकारं निराकाराः शुकं दृष्ट्वा विवाससः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथ वा गुहाम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा |
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
शून्यागाराणि चैकाग्रो निवासार्थमुपक्रमेत् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
शून्यात्तच्च गृहान्मांसं यदद्यापहृतं तव |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शून्यान्कुर्वन्रथोपस्थान्मानवैः संस्तरन्महीम् |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
शून्यान्कृतान्रथोपस्थान्सात्वतेनार्जुनेन च |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
शून्यामिव च पश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
शून्यामिव च पश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शून्यासीत्पृथिवी सर्वा वालवृद्धावशेषिता |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
शून्ये तु तमुपादाय़ पक्षिणं समजातकम् |
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शून्येव पृथिवी सर्वा वालवृद्धावशेषिता |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
शून्येऽर्जुनेऽसंनिहिते च तात; त्वमेव कृष्णां भजसेऽसुखेषु ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
शून्येय़ं च मही सर्वा न मे प्रीतिकरी शुभे |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानताः ||
२० ख