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द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
व्यशोभन्त तदा शीघ्रा दीपय़न्तो दिशो दश ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
व्यशोषय़त दुःशोषं तीव्रैः शरगभस्तिभिः ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय २२
द्रौपद्यु उवाच
व्यश्रूय़त महाय़ुद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
व्यश्रूय़न्त महाघोराः शव्दास्तत्र समन्ततः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
व्यश्वः सदश्वो वध्र्यश्वः पञ्चहस्तः पृथुश्रवाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
व्यश्वनागरथान्दृष्ट्वा तत्र वीरान्सहस्रशः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतध्वजं चक्रे क्षेमधूर्तिं महारथम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतध्वजरथान्विप्रविद्धाय़ुधान्रिपून् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धादसम्भ्रमम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धाद्युधिष्ठिरम् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चक्रे पार्षतं तु द्विजोत्तमः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चक्रे सव्यसाची महारथः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथं चैनं द्रौणिश्चक्रे महाहवे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वसूतरथांश्चक्रे कुमारान्कुपितो रणे ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
व्यश्वारोहांश्च तुरगान्पत्तीन्व्याय़ुधजीवितान् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
व्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वरः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
व्यषीदत्कौरवी सेना भिन्ना नौरिव सागरे ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
व्यषीदन्त नरा राजञ्शङ्खशव्देन मारिष |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
व्यष्टम्भय़च्छरैः कर्णो भूमौ चैनामपातय़त् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
व्यष्टम्भय़द्रणे वाणैः सौभद्रः परवीरहा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
व्यष्टम्भय़ेतामन्योन्यं प्राणद्यूताभिदेविनौ ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
व्यसनं चतुष्टय़ं प्रोक्तं यै राजन्भ्रश्यते श्रिय़ः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
व्यसनं चाभ्युपेतानां विभर्षि भरतर्षभ ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसनं नाम तद्राजन्न स धर्मः कुधर्म तत् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
व्यसनं परमं प्राप्तः किमाह परमाहवे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यसनं भवतश्चेदं सङ्क्षेपाद्वै निवेदितम् ||
५० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारय़ेत्ततः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसनं वः समभ्यागात्कोऽय़ं विधिविपर्ययः |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
व्यसनं वा पुनर्घोरं समृद्धिं वापि तादृशीम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विनाशं वा युधिष्ठिर |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसनाद्विषय़ाक्रान्तं न भजन्ति नृपं श्रिय़ः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
व्यसनानि च सर्वाणि त्यजेथा भूरिदक्षिण |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
व्यसनान्नित्यभीतोऽसौ समृद्ध्यामेव तृप्यते |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
व्यसनान्युपवर्तन्ते विविधानि नराधिप |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
व्यसने न प्रहर्तव्यं न भीताय़ जिताय़ च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
व्यसने यः परित्यागी दुरात्मा निरपत्रपः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
व्यसने वर्तमानस्य कृतवर्मा नृशंसवत् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
व्यसने वर्तमानाय़ प्रहरन्ति मनस्विनः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ||
१०१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
व्यसनैः क्लिश्यमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यतः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसनैर्न तु संय़ोगं प्राप्नोति विजितेन्द्रिय़ः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
व्यसर्जय़च्च राजानं शय़नं च विवेश ह ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
व्यसर्जय़न्महाराज देवराजः शतक्रतुः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात्कालहता इव ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
व्यसिचर्मेषुपूर्णाङ्गः सोऽन्तरिक्षात्पुनः क्षितिम् |
३८ क