शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शूराणां हर्षजननी भीरूणां भय़वर्धिनी |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
शूराणां हर्षजननो भीरूणां भय़वर्धनः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
शूराणामपि पार्थानां हृदय़ानि चकम्पिरे ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शूराणामश्वपृष्ठेभ्यः शिरांसि निचकर्त ह ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
शूराणामार्यवृत्तानां सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनाम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
शूरानहं भक्तिमतः शृणोमि; प्रीत्या युक्तान्संश्रितान्धर्मराजम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शूरान्प्रहरतो दृष्ट्वा कृतास्त्रान्रुधिरोक्षितान् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
शूरान्भक्तानसंहार्यान्कुले जातानरोगिणः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
शूरान्वय़ानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव ह ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शूरान्सम्पततश्चान्यान्कालरात्र्यै न्यवेदय़त् ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
शूराश्च कृतविद्याश्च धनुर्वेदे च निष्ठिताः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्च कृतविद्याश्च वुद्धिमन्तो जितेन्द्रिय़ाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
शूराश्च कृतविद्याश्च स्पर्धन्ते च परस्परम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
शूराश्च भद्रकाश्चैव शरकाण्डनिभा हय़ाः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
शूराश्च वलवन्तश्च कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
शूराश्च वलवन्तश्च विक्रान्ताश्च महारथाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्च वलवन्तश्च संय़ुगेष्वपलाय़िनः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
शूराश्च हि कृतास्त्राश्च वलिनः स्वर्गलिप्सवः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्च हि कृतास्त्राश्च सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
शूराश्चपलचित्ताश्च ते भवन्ति दुरासदाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्चार्याश्च सत्कार्या विद्वांसश्च युधिष्ठिर |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
शूरास्तु समरे राजन्भय़ं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शूरास्थिचय़सङ्कीर्णां प्रेतकूलापहारिणीम् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
शूरेण वलिना सार्धं पाण्डवेन किरीटिना ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
शूरैः परिवृतं योधैः कुण्डलाङ्गदधारिभिः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
शूरैः परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभिः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शूरैः शिक्षावलोपेतैस्तरुणैरत्यमर्षणैः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
शूरो भय़ेष्वर्थकृच्छ्रेषु धीरः; कृच्छ्रास्वापत्सु सुहृदश्चारय़श्च ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
शूरो हि सत्यमन्युभ्यामाविष्टो युध्यते भृशम् |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
शूरोऽस्मीति न दृप्तः स्याद्वुद्धिमानिति वा पुनः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
शूरोऽहमिति दुर्वुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वतः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
कर्ण उवाच
शूरोऽय़ं समरश्लाघी दुर्मतिश्च द्विजाधमः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शूलं निपतितं दृष्ट्वा द्विधा कृत्तं स पार्थिवः |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीय़मिव शङ्करम् ||
१४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
शूलक्रव्यादसङ्घुष्टं भूतय़क्षगणाकुलम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
शूलपाणिं महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ||
८५ ग
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
शूलपाणिरथोवाच तुष्टोऽस्मीति परन्तप ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुणः पाशवानिव |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
शूलपाणिर्महान्कृष्ण तेजसा सूर्यसंनिभः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
शूलपाणिश्च भगवान्प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
शूलप्रासासिमुसलजलप्रस्रवणो महान् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
शूलप्रासासिमुसलजलप्रस्रवणो महान् ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं व्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तय़ा |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तय़ा |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
शूलमुद्गरहस्तैश्च नानाप्रहरणैरपि ||
२४ ख