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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
आदेशे तव तिष्ठन्ती हितं कुर्यां नरोत्तम ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
आदौ कृतय़ुगे तस्मिन्वर्तमाने यथाविधि |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
आदौ छन्दांसि विज्ञाय़ द्विजानां श्रुतमेव च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आदौ न कुरुते श्रेय़ः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
आदौ प्रवर्तिते चक्रे तथैवादिपराय़णे |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
आदौ मध्ये तथा चान्ते यथातत्त्वेन तत्त्ववित् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
आदौ वा यदि वा पश्चात्तवेदं कर्म मारिष |
७९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
आद्यं लिङ्गं यस्य तस्य प्रमाण; मापद्धर्मं सञ्जय़ तं निवोध ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
आद्यं स्वस्त्ययनं चैव तत्रावाप्य महत्फलम् ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
आद्यः कठस्तैत्तिरिश्च वैशम्पाय़नपूर्वजः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
आद्यः प्रकीर्तितो राजन्सर्वपापप्रमोचनः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
युधिष्ठिर उवाच
आद्यन्तं सर्वभूतानां श्रोतुमिच्छामि कौरव |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय़ न तेषु रमते वुधः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
आद्यन्तवन्ति कर्माणि शरीरं कर्मवन्धनम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
आद्रवन्तं सहानीकं सहानीको न्यवारय़त् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
आद्रवन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसं युद्धदुर्मदम् |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
आद्रवन्ति रणे हृष्टा हर्षय़न्तः पितामहम् ||
६८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
आद्रवन्नेव भग्नास्ते पाण्डवैस्तव सैनिकाः ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
आधानादीनि कर्माणि प्राप्य वेदमधीत्य च ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
आधानादीनि कर्माणि शक्तिमान्न करोति यः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
व्रह्मो उवाच
आधारं तु प्रवक्ष्यामि एकस्य पुरुषस्य ते ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
आधारं सर्वविद्यानां तमस्मि मनसा गतः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
आधारः सर्वविद्यानां स धारय़ति कुण्डले ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आधारनिलय़ो धाता पुष्पहासः प्रजागरः |
११५ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
आधाररूपा पुनरस्य कण्ठे; विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
आधावाभ्येहि मा गच्छ किं भीतोऽसि क्व यास्यसि |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
आधाय़ चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
आधाय़ विपुलं क्रोधं पुनरेवेदमव्रवीत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
आधिपत्यं ददौ शक्रः सत्कृत्य वरदस्तदा ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
आधिपत्ये तथा तुल्ये निग्रहानुग्रहात्मनि |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
आधिपत्येन कैलासे धनदोऽप्यभिषेचितः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
आधिभिर्दह्यमानाय़ा मतिः सञ्चलिता मम |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
माण्डव्य उवाच
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि ||
३४ ग
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
आधिभिश्चैव वाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३१
व्राह्मण उवाच
आधिराज्यं पुरस्कृत्य लोभमेकं निकृन्तता ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
आधिराज्यं महद्दीप्तं प्रथितं मधुसूदन |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
आधिराज्यं महद्दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
आधिव्याधिप्रशमनं क्रिय़ाय़ोगद्वय़ेन तु ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
आधुन्वन्तौ गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
आधूतां भीमसेनेन गदां दृष्ट्वा सुय़ोधनः |
३० क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
आधूय़ वेगेन विसञ्ज्ञकल्पा; मुवाच दासीति हसन्निवोग्रः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
आधेय़ं तु मय़ा भूय़ो यशस्तव महाद्युते |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
आध्वर्यवं च ते कृष्ण क्रतावस्मिन्भविष्यति ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
आधय़ो व्याधय़श्चैव भगवंस्तनय़ास्तव ||
३६ ख