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उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
शृण्वतः कुरुमुख्यस्य द्रोणस्यापि च शृण्वतः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
शृण्वतां कुरुवीराणां तन्निवोध नराधिप ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वतां तु महाराज कथां तां रोमहर्षणीम् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वतां पार्थिवेन्द्राणामन्येषां चैव सर्वशः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय़ भारत ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
देवव्रत उवाच
शृण्वतां भूमिपालानां यद्व्रवीमि पितुः कृते ||
८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
शृण्वतां लोकवीराणामिदं वचनमव्रवीत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वतां लोमशोक्तानि वाक्यानि विविधानि च ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
शृण्वतां सर्वभूतानां संरव्धो वाक्यकोविदः ||
५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
शृण्वतां सर्वभूतानामुच्चैर्वाचः स्म मेनिरे |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
शृण्वती भवति श्रोत्रं स्पृशती स्पर्श उच्यते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
धृतराष्ट्र उवाच
शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिर्विचित्राणीह भाषसे ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वतो विविधा वाचो विदुरस्य महात्मनः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
शृण्वत्सु तेषु सर्वेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वन्तः प्रीतिजननान्वल्गून्मदकलाञ्शुभान् |
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६
विराट उवाच
शृण्वन्तु मे जानपदाः समागताः; कङ्को यथाहं विषय़े प्रभुस्तथा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
शृण्वन्तु वक्ष्यामि तवापराधं; पापस्य सामात्यपरिच्छदस्य ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वन्त्येकाग्रमनसो व्राह्मणाः कुरुजाङ्गलाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वन्त्वेतद्भवन्तोऽस्य देवदूतस्य भाषितम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
शृण्वन्दिव्या वहुविधाः कथाः श्रुतिमनोहराः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
शृण्वन्पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
शृण्वन्विवेश धर्मात्मा फल्गुनो यज्ञसंस्तरम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
शृण्वन्वै गीतशव्दं च तूर्यशव्दं च पुष्कलम् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
शृण्वन्सुरमणीय़ानि विप्रोऽगच्छत गौतमः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रीतविचेष्टितम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
शेकुस्ते सर्वराजानस्तपन्तमिव भास्करम् ||
८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
शेते चतुर्थी त्वपरा निद्रां वर्षसहस्रिकाम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
शेते चन्दनपूर्णेन पूजितो वहुलाः समाः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
शेते निपतिता भूमौ सुखार्हा वरवर्णिनी ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः; कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
शेते प्राकृतवद्भूमावतो दुःखतरं नु किम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
शेते मय़ा निहता भारती च; चमू राजन्देवचमूप्रकाशा |
९७ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
शेते लोकविनाशाय़ तप आस्थाय़ दारुणम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
शेते लोकविनाशाय़ तपोवलसमाश्रितः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
शेते वनमिदं प्राप्य विश्वस्ता स्वगृहे यथा ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
शेते विनिहतः सङ्ख्ये हत्वा शत्रून्सहस्रशः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
शेते विनिहतो वीरः शक्रेणेव यथा वलः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शेते स कृष्णेन हतः परासु; र्वातेनेव मथितः कर्णिकारः ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
शेते सह शय़ानेन येन येन यथा कृतम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
शेते स्म निहतो भूमौ काम्वोजास्तरणोचितः |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
शेतेऽद्य पापः स विभिन्नगात्रः; कच्चिद्भग्नो धार्तराष्ट्रस्य वाहुः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
शेतेऽसौ शरदीर्णाङ्गः शत्रुस्ते कुरुपुङ्गव |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
शेरते निहता देव गतसत्त्वाः परासवः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शेरते भूमिमासाद्य शैला वज्रहता इव ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शेरते युधि निर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं वहु ||
७१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
शेरते लोहिताक्ताङ्गाः पृथिव्यां शरविक्षताः ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शेरते स्म तदा राजन्कौन्तेय़स्याभितो रथम् ||
३० ख