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स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
शेरतेऽभिमुखाः शूरा दय़िता इव योषितः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
शेषं किञ्चित्प्रपश्यामि प्रत्यनीके महीक्षिताम् ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
शेषं कुर्याद्गिरेर्वज्रं निपतन्मूर्ध्नि सञ्जय़ |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
शेषं चाकल्पय़द्देवमनन्तमिति यं विदुः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
शेषं तु दशधा कार्यं व्राह्मणस्वं युधिष्ठिर |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
शेषं विघससञ्ज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
शेषमन्यन्मनुष्याणां कामचारमिह स्मृतम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
युधिष्ठिर उवाच
शेषमल्पं दिनानां ते दक्षिणाय़नभास्करे |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
शेषवन्तो न शकिता नय़ितुं यमसादनम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
शेषसम्प्रतिपत्तिस्तु वुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ||
१४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव; देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ||
५० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
शेषस्य रक्षणार्थं च सन्धास्यति सुय़ोधनः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
शेषस्यांशस्तु नागस्य वलदेवो महावलः |
९१ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः |
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
शेषा नृपतय़ो वीराः स्थिता व्यूहस्य दंशिताः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
शेषा येऽन्येऽभवंस्तत्र ते भीमस्य भय़ार्दिताः |
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
शेषा विमनसो भूत्वा प्राद्रवन्त महारथाः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
कर्ण उवाच
शेषा विमनसो व्यक्तं न योत्स्यन्ते हि भारत ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
शेषाः प्रजानां पतय़ः स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
शेषाः प्रतिय़युर्यत्ता भीममेव महारथम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
शेषाः सृष्टा ह्यन्तवन्तो ह्यनन्ताः; सुप्रस्थानाः क्षत्रधर्माविशिष्टाः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
शेषाणि चावदातानि पानीय़ं चैव भोजने ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
शेषान्नभुक्सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो; हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्याय़ं यथाविधि |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
शेषाशी विजिताहारो निष्कामो निरहंवदः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
शेषाश्च विवुधश्रेष्ठा दैत्यदानवराक्षसाः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शेषास्तु छिन्नधन्वानं शरवर्षैरवाकिरन् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
शेषास्तु पाण्डवा राजन्नैवोचुः किञ्चिदप्रिय़म् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
शेषास्त्वन्ये महाराज शेषानेव महारथान् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
शेषे विनिहतो भूमौ प्राकृतः कुनृपो यथा ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
गान्धार्यु उवाच
शेषे ह्यवस्थिते तात पुत्राणामन्तके त्वय़ि |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
शेषेणैवास्य कार्येण प्रज्ञास्याम्यहमाय़ुषः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
शेषेभ्यश्चैव वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदोद्गतं वसु |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
शेषेष्वन्येषु कालेषु स्वातन्त्र्यं स्त्री किलार्हति |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
शेषैः कृतं पारिषदैराय़ुधानां परिग्रहम् ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
शेषो भूत्वाहमेवैतां धारय़ामि वसुन्धराम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
शेषो हि वलमासाद्य न शेषमवशेषय़ेत् |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
शेषोत्सर्गे कर्मभिर्देहमोक्षे; सरस्वत्यः श्रेय़सि सम्प्रवृत्ताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शेषोऽनन्तो वासुकिश्च तक्षकश्च भुजङ्गमः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
शेषोऽप्येवं भविता वो न संशय़ो; योनिं सर्वे मानुषीमाविशध्वम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
व्रह्मो उवाच
शेषोऽसि नागोत्तम धर्मदेवो; महीमिमां धारय़से यदेकः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
शेष्यन्ते निहता भूमौ श्वशृगालादनीकृताः ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
शेषय़ेदशनिर्दीप्तो निपतन्मूर्ध्नि सञ्जय़ |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
शैक्यं रुक्मसहस्रस्य वहुरत्नविभूषितम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
शैक्यया वीरघातिन्या गदय़ा विचरिष्यति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
शैक्यां तात चतुष्किष्कुं षडस्रिममितौजसम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
शैक्यां व्यालीमिवात्युग्रां वज्रकल्पामय़स्मय़ीम् ||
४४ ख