वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रप्रभृतय़श्चैव सर्वे ते सुरसत्तमाः |
११ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रप्रस्थमहं नेष्ये वृष्ण्यन्धकजनं स्वय़म् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रप्रिय़ैषी यं विद्वान्प्रत्याचष्ट वृहस्पतिः |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रभक्त्या तु ते पाणिं न दास्यामि कथञ्चन ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रमेव प्रपद्यस्व स तेऽस्त्राणि प्रदास्यति |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृतः |
८८ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाम्विकासुतः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
शक्रलोकगतः श्रीमान्मोदते च निरामय़ः ||
५७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रविष्णू हि सङ्ग्रामे चेरतुस्तारकामय़े |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
शक्रवीर्यसमो युद्धे यमतुल्यपराक्रमः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रवीर्योपमाश्चैव दीप्त्या वह्निसमास्तथा ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
भीष्म उवाच
शक्रशम्वरसंवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
शक्रश्च धनमक्षय़्यं प्रादात्तस्य युधिष्ठिर |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्श्रिय़ा वृतः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रश्चाग्निश्च वाय़ुश्च यमो वरुण एव च |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रश्चापि तय़ोर्वीर्यमुपलभ्यासकृद्रणे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शक्रसख्याद्द्विपवलैर्वय़सा चापि विस्मितम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रसद्मप्रतीकाशो वभूव स हि शैलराट् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रस्तथाभ्ययाद्द्रष्टुं कुमारवरमच्युतम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
शक्रस्तु वीर्यसदृशमिध्मभारं गिरिप्रभम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रस्तोषय़ितव्यो वै मय़ा त्रिभुवनेश्वरः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निगृहीतः किलाभवत् ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा वध्नाम्यहं तव ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
शक्रस्य च सुरेन्द्रस्य वृत्रस्य च महात्मनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजाय़त |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम् |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मभिर्जिता |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
शक्रस्य नीतिं प्रवदन्विद्वान्देवपुरोहितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रस्य मतमाज्ञाय़ पार्थमानर्चुरञ्जसा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
शक्रस्य यज्ञः शतसङ्ख्य उक्त; स्तथापरस्तुल्यसङ्ख्यः शतं वै |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रस्य हस्ताद्दय़ितं वज्रमस्त्रं दुरुत्सहम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
शक्रस्यातिथितां गत्वा विशोका ह्यभवन्मुदा ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
शक्रस्याद्य विमोक्षार्थं चतुर्भागं प्रतीच्छ मे ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
शक्रस्यापि व्यथां कुर्युः संय़ुगे भरतर्षभ ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
शक्रस्यार्धासनं राजँल्लव्धवानमितद्युतिः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रस्यार्धासनगतं तत्र मे विस्मय़ो महान् |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
शक्रस्याय़ं सखा चैव मन्त्री सारथिरेव च |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
शक्रस्योदस्य चरणं प्रस्थितो जनमेजय़ः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
शक्राच्च लव्धो हि वरो मय़ैष; पतिष्यता भूमितले नरेन्द्र ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्महत्यो उवाच
शक्रादपगमिष्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
शक्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान्देवगणांस्तथा ||
१०७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः ||
१४५ ख
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिस्वनम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
शक्राशनिरिवोत्सृष्टा विदार्य धरणीतलम् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
शक्राशनिसमस्पर्शं मृत्युदण्डमिवापरम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
शक्राशनिसमस्पर्शान्विमुञ्चन्निशिताञ्शरान् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शक्राय़ शक्ररूपाय़ शक्रवेषधराय़ च ||
१५० ख