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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
शोचन्तो मातरं वृद्धामूषुर्नातिचिरं पुरे ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शोचन्नन्दय़ते शत्रून्कर्शय़त्यपि वान्धवान् |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
शोचन्युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमव्रवीत् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
शोचमानाः पाण्डुपुत्रानतीव भरतर्षभ ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
शोचमानो महाराज भ्रातृभिः सहितस्तदा ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
शोचमानोऽतिमात्रं स दह्यमानश्च मन्युना ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
शोचस्युपेत्य कारुण्याच्छृणु ये वै वय़ं द्विज ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
शोचामि त्वां महाराज दुःखानर्हं सुखोचितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
शोचामि पृथिवीं हीनां पञ्चभिः पर्वतैरिव ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
शोचितव्यं मय़ा चैव गान्धार्या च विशां पते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
शोचेद्धि वैरं कुर्वाणो यथा वै शल्मलिस्तथा ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
शोच्या गान्धारी पुत्रपौत्रैर्विहीना; तथा वध्वः पितृभिर्भ्रातृभिश्च |
१५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
शोच्या भवति वन्धूनां पतिहीना मनस्विनी ||
२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शोच्यामपि दशां प्राप्तो रराजैव स पर्वतः ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
शोच्येय़ं भारती सेना राजा चैव सुय़ोधनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
शोचय़त्येष निपतन्भूय़ः पुत्रवधाद्धि माम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां कम्पुनामपि ||
९५ ग
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
शोणस्य ज्योतिरथ्याश्च सङ्गमे निवसञ्शुचिः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
शोणस्य नर्मदाय़ाश्च प्रभवे कुरुनन्दन |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शोणानां जघनार्धेषु तत्सैन्याः समपूजय़न् ||
१३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शोणाश्च पर्यमुच्यन्त रथवन्धाद्विशां पते ||
१४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
शोणाश्वं रथमास्थाय़ नरवीरः समाहितः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
शोणाश्ववाहस्य हय़ान्निहत्य; वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्वः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
शोणाश्वय़ुक्तेषु रथेषु सर्वे; मखेषु दीप्ता इव हव्यवाहाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शोणितं निर्वमन्ति स्म द्विपाः पार्थशराहताः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
शोणितं यावतः पांसून्सङ्गृह्णीय़ाद्द्विजक्षतात् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंमतम् ||
३६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
शोणितव्यतिषिक्ताय़ां वसुधाय़ां च भूमिप |
१२१ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
शोणिताक्ता व्यदृश्यन्त पुष्पिता इव किंशुकाः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्ता व्यराजन्त शक्रगोपा इवानघ ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्तां गदां विभ्रदुक्षितो गजशोणितैः |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्तां गदां विभ्रन्मेदोमज्जाकृतच्छविः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्तान्हय़ारोहान्गृहीतप्रासतोमरान् |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
शोणिताक्तार्द्रवसना द्रौपदी वाक्यमव्रवीत् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेश्यभिनिर्ययौ ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्तैस्तदा रक्तं सर्वमासीद्विशां पते ||
१०८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
शोणिताक्तौ व्यराजेतां कालसूर्याविवोदितौ ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
शोणितादिग्धवाजाग्राः सप्त हेमपरिष्कृताः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शोणिताभ्युक्षिताङ्गस्य रुद्रस्येवोर्जितं महत् ||
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश वृहन्नडा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद्भूमिमरिन्दमः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शोणितैः सिच्यमानानि वस्त्राणि कवचानि च |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदं रथावर्तं गजद्वीपं हय़ोर्मिणम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदा महानद्यः प्रसस्रुस्तत्र चासकृत् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदा रथावर्ता ध्वजवृक्षास्थिशर्करा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
शोणितोदा सुसम्पूर्णा दुस्तरा पारगैर्नरैः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदां महीं कृत्वा मांसमज्जास्थिवाहिनीम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदां रथावर्तां कृत्वा विशसने नदीम् |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
शोणितोदां रथावर्तां नागनक्रां दुरत्ययाम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदां रथावर्तां हस्तिग्राहसमाकुलाम् |
२९ क