कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदां रथावर्तां हस्तिग्राहसमाकुलाम् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
शोणितोदां रथावर्तां हस्त्यश्वकृतरोधसम् |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
शोणितौघपरीताङ्गं शय़ानं पतितं भुवि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
शोणितौघमहावेगां द्रौणिः प्रावर्तय़न्नदीम् |
१२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शोणैर्हय़ै रुक्मरथो महात्मा; द्रोणो महावाहुरदीनसत्त्वः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
शोधय़ित्वा ततस्तीर्थमृषय़स्ते तपोधनाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
शोभनं कृतं भवता राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने स्वर्गे पुनः प्रतिपादय़तेति ||
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
शोभनं भीरु सत्यं चेदथ स ज्ञाय़ते द्विजः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
शोभनं शोभनं कर्ण सनाथः कुरुपुङ्गवः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
शोभमाना यथा ताभ्यां कुण्डलाभ्यां तस्मिन्नहनि सम्पादय़स्व |
१०० 7
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
शोभमाना रथे युक्तास्तरिष्यन्त इवाशुगाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
शोभमानो महाराज विष्णुलोकं प्रपद्यते ||
१५० ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
शोभसे कुण्डलाभ्यां हि रुचिराभ्यां महाद्युते |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
शोभार्थं चापरान्यूपान्काञ्चनान्पुरुषर्षभ |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शोभितं पुरुषव्याघ्रैर्भीष्मकर्णाभिमन्युभिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धुतैः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
शोभितं सर्वतोरम्यैः पुंस्कोकिलकुलाकुलैः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
शोभिता पुरुषैः शूरैः पुत्रैश्चास्य महारथैः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
शोभेथास्त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
शोभय़न्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शोभय़न्ति महाशैलं नानारजतधातवः ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
शोभय़न्मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातितः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
शोभय़ेय़ुः पुरवरं मोदय़ेय़ुश्च सर्वशः ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
शोशुभ्यते वलवृत्रघ्न भूय़ः; पिवस्व सोमं सुतमुद्यतं मय़ा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
शोशुभ्यमानः कौन्तेय़ आनुपूर्व्यान्महाभुजः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
शोषणं सागरस्येव पर्वतस्येव चालनम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
शोषय़त्येव पातालं विवान्गन्धवहः शुचिः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शोषय़न्केकय़ान्सर्वाञ्जगामाशु वसुन्धराम् ||
२१ ग
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
शोषय़न्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
शोषय़िष्यामि गात्राणि व्याली तालगता यथा ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
शोषय़िष्ये प्रिय़ान्प्राणानिहस्थोऽहं तपोधन ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
शोषय़ेय़ं समुद्रांश्च तेजसा स्वेन पार्थिव ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शोषय़ेय़ुश्च गात्राणि स्वाध्याय़ैः संय़तेन्द्रिय़ाः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
शौचं कृत्वा यथान्याय़ं प्राञ्जलिः प्रय़तो नृपः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
शौचं तु यावत्कुरुते भाजनस्य कुटुम्विनी ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शौचं निवर्तय़न्तस्ते तत्रोषुर्नगराद्वहिः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शौचं निवर्तय़िष्यन्तो मासमेकं वहिः पुरात् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
शौचं रागो लघुस्तैक्ष्ण्यं दशमं चोर्ध्वभागिता ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
शौचदास्मि सुदेष्णाय़ा अक्षधूर्तस्य कारणात् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
शौचमार्जवमाचारमलौल्यं हृद्यसम्भ्रमः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
शौचमावश्यकं कृत्वा देवतानां च तर्पणम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
शौचमाहारतः शुद्धिरिन्द्रिय़ाणां च संय़मः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
शौचमाहारसंशुद्धिरिन्द्रिय़ाणां च निग्रहः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
शौचलक्षणमेतत्ते सर्वत्रैवान्ववेक्षणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
शौचाचारसमाय़ुक्ताञ्जितक्रोधाञ्जितेन्द्रिय़ान् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रिय़ः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
शौचार्थं यो नदीं चक्रे दुर्गमां वहुभिर्जलैः |
३० क