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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
युधिष्ठिर उवाच
शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मावथो कथम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मावथो कथम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
शौचाशौचे न ते सक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शत्रुहन् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
शौचेन त्वागसस्त्यागैः शुद्धेन मनसा तथा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
शौचेन लभते विप्रः क्षत्रिय़ो विक्रमेण च |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचय़श्च ते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
शौचेन सततं युक्तस्तथाचारसमन्वितः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
शौटीरमानी पुत्रो मे कान्यभाषत सञ्जय़ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
शौटीराणामशौटीरमधर्म्यं कृपणं च तत् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
शौण्डिका दरदा दर्वाश्चौराः शवरवर्वराः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
शौण्डिकाः कुक्कुराश्चैव शकाश्चैव विशां पते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
शौद्रं हि कुर्वतः कर्म धर्मः समुपरुध्यते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च जपतां वरः |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
शौरिरस्मि हृषीकेशो नृवीरौ पाण्डवाविमौ ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
शौरे रथं वाहय़तोऽर्जुनस्य; वलं महास्त्राणि च पाण्डवस्य |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
शौरेरभीशुहस्तस्य पार्थस्य च धनुष्मतः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
शौर्यं च चित्रभाष्यं च दश संसर्गय़ोनय़ः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
शौर्यं च नाम नेतॄणां स्पर्धते च परस्परम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलाय़नम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
शौर्यं वलं च सत्त्वं च पिता तव सदाव्रवीत् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
शौर्यमेकस्थमाचार्ये वलं शौर्यं च पाण्डवे ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
शौर्याद्धि वल्लभो राज्ञो महासत्त्वश्च कीचकः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
भगवानु उवाच
शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रिय़ो नास्ति ते समः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
श्मशानगोचरं सूते वाह्यैरपि वहिष्कृतम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
श्मशानचारी भगवान्खचरो गोचरोऽर्दनः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
श्मशानचैत्यद्रुमवद्भूषितोऽपि भय़ङ्करः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
श्मशानमभितो गत्वा आससाद कुरूनथ ||
४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
श्मशानवासिनं दृप्तं महागणपतिं प्रभुम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगय़ता तदा ||
८९ ख
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
श्मशानाभिमुखः प्राय़ाद्यत्र ते कीचका गताः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
श्मशाने च निराहाराः प्रतिनन्दन्ति देहिनः ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
श्मशाने तस्य चावासो गोमाय़ोः संमतोऽभवत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
श्मशाने पुत्रमुत्सृज्य कस्माद्गच्छथ निर्घृणाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
श्मशाने यदि वासो मे समाधिर्मे निशाम्यताम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
श्मशाने ह्यपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
श्मश्रु लोम च केशाश्च सिराः स्नाय़ु च चर्म च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
श्मश्रुकर्मणि मङ्गल्यं क्षुतानामभिनन्दनम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
श्मश्रुकर्मणि सम्प्राप्ते क्षुते स्नानेऽथ भोजने |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
श्यामं वृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
श्यामां वारणपुष्पीं च तथाष्टापदिकां लताम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
श्यामाकभोजनं तत्र यः प्रय़च्छति मानवः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपत्नी सुवर्चला |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
श्यामानां निष्ककण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भय़ावहम् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यो हेमाभरणभूषिताः |
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
श्यामाय़नोऽथ गार्ग्यश्च जावालिः सुश्रुतस्तथा |
५४ क