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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
श्रवणं स्पर्शनं जिह्वा दृष्टिर्नासा तथैव च |
१० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसङ्कीर्तनादपि |
७५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
श्रवणाद्धि विजानीमः पाञ्चालान्कुरुभिः सह ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
श्रवणान्नामधेय़ानां पाण्डवानां च कीर्तनात् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
श्रवणाभ्यामथो पद्भ्यां संहतेन करेण च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
श्रवणे कम्वलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव च |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
श्रवणे तु ददच्छ्राद्धं प्रेत्य गच्छेत्परां गतिम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
श्रवाढ्यस्त्वं महाभाग परं स्नेहेन पश्यसि ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
श्रवास्तस्य सुतश्चर्षिः श्रवसश्चाभवत्तमः ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
श्रविष्ठादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादय़ः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
श्राद्धं त्वभिजिता कुर्वन्विद्यां श्रेष्ठामवाप्नुय़ात् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
श्राद्धं मृतं कथं च स्यात्कथं यज्ञो मृतो भवेत् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
श्राद्धं यः कृत्तिकाय़ोगे कुर्वीत सततं नरः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धं सङ्कल्पय़ामास जमदग्निः पुरा किल |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
श्राद्धकर्मणि तिथ्यः स्युः प्रशस्ता न तथेतराः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
श्राद्धकर्मातिथेय़ं च सत्यमक्रोध एव च ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
युधिष्ठिर उवाच
श्राद्धकाले च दैवे च धर्मे चापि पितामह |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
श्राद्धपर्व ततो ज्ञेय़ं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् |
६२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धमिच्छति दातुं स गाङ्गेय़स्य महात्मनः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
श्राद्धसङ्गतिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
श्राद्धस्य कालमाख्याहि ततः पिव हरस्व च ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
श्राद्धस्य व्राह्मणः कालः कथं वा यक्ष मन्यसे ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
श्राद्धस्य व्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
श्राद्धस्य हूय़मानस्य व्रह्मभूय़ं स गच्छति ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धानि कारय़ामास तेषां पृथगुदारधीः ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धानि पुरुषव्याघ्र मादात्कौरवको नृपः ||
१७ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धान्युद्दिश्य सर्वेषां चकार विधिवत्तदा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
श्राद्धापवर्गे विप्रस्य स्वधा वै स्वदिता भवेत् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद्व्राह्मणान्वुधः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टा व्राह्मणा भरतर्षभ |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्राद्धे दैवे च पुरुषा ये च नित्यं धृतव्रताः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
जमदग्निरु उवाच
श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीय़ाद्यस्ते हरति पुष्करम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
श्राद्धेषु च भवानाह पितॄनामिषकाङ्क्षिणः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
श्राद्धय़ज्ञक्रिय़ाय़ां च तथा दानप्रतिग्रहे ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
श्रान्तं चैनं समालक्ष्य ज्ञात्वा दूरे च सैन्धवम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
श्रान्तं भीतं भ्रष्टशस्त्रं रुदन्तं; पराङ्मुखं परिवर्हैश्च हीनम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ||
८० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
श्रान्तश्चैष महावाहुरल्पप्राणश्च साम्प्रतम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तय़ानस्य तत्सुखम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्ता दुःखपरीता च वातवर्षेण तेन च |
२ क
वन पर्व
अध्याय १४४
नकुल उवाच
श्रान्ता निपतिता भूमौ तामवेक्षस्व भारत ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्ता भवन्तः सुभृशं तापिताः शोकमन्युभिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
श्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथञ्चन ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहाम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्ताः प्रसुप्तास्तत्रेमे मात्रा सह सुदुःखिताः |
८६ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
श्रान्ताः स्म सुभृशं व्रह्मन्नोद्भवत्यमृतं च तत् ||
२८ ख