शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलाय़ुषाम् |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्तानां चाप्यनाथानां नासीत्काचन चेतना |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
श्रान्तान्न्यस्ताय़ुधान्सर्वान्क्षणेनैव व्यपोथय़त् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेतं समूहतुः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
श्रान्ताय़ क्षुधिताय़ान्नं यः प्रय़च्छति भूमिप |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
श्रान्ताय़ादृष्टपूर्वाय़ तस्य पुण्यफलं महत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
श्रान्ताय़ादृष्टपूर्वाय़ स महद्धर्ममाप्नुय़ात् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
श्रान्तो न्यषीदद्धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्तोऽस्मि वय़सानेन तथा पुत्रविनाकृतः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्तय़ुग्यः श्रान्तहय़ो मृगलिप्सुः पिपासितः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
श्रावणं निय़तो मासमेकभक्तेन यः क्षपेत् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रावस्तस्य तु दाय़ादो वृहदश्वो महावलः |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
श्रावितश्च मय़ा वाक्यं त्वदीय़ं स महाजने |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
श्रावितश्चापि तद्वाक्यं गृहमभ्यागतः प्रभो ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्विचालितः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रावितस्त्वं मय़ा गुह्यं ज्ञापितश्च सनातनम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
श्रावय़न्तो हि वहवस्तत्र योधा विशां पते |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
श्रावय़ां चक्रिरे विप्रा दमय़न्त्या यथेरितम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
श्रावय़ामास चेन्द्रस्तं विरूपाक्षं पुरातनम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्रावय़ामास राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ||
१४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
श्रावय़ामास राजेन्द्र पितॄणां मुनिसत्तमः ||
११० ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
श्रावय़ामास विधिवत्तदा कर्मान्तरेषु सः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रावय़ित्वा तदात्मानं ततो दग्ध्वा च तां पुरीम् |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
श्रावय़ेच्चतुरो वर्णान्कृत्वा व्राह्मणमग्रतः ||
४५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
श्रावय़ेद्यस्तु वर्णांस्त्रीन्कृत्वा व्राह्मणमग्रतः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिता वागभवत्सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
श्रिता विरजसं देवं यमाहुः परमं पदम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
श्रितान्व्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रिय़ान्भुवि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
श्रितो मूर्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालय़न् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
श्रिय़ एताः स्त्रिय़ो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
श्रिय़ं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
श्रिय़ं च लोके लभते समग्रां; मन्ये चास्मै शत्रवः संनमन्ते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
श्रिय़ं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
श्रिय़ं तथाविधां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
श्रिय़ं ते सम्प्रय़च्छन्ति द्विषद्भ्यो भरतर्षभ ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
श्रिय़ं ददाति कस्मैचित्कस्माच्चिदपकर्षति |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
श्रिय़ं ददृशतुः पद्मां साक्षात्पद्मतलस्थिताम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
श्रिय़ं दिव्यामभिप्रेप्सुर्व्रह्म वाङ्मनसा शुचिः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
श्रिय़ं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूय़ामि निरर्थकम् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ं यौधिष्ठिरीं तावद्भुङ्क्ष्व पार्थवलार्जिताम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
श्रिय़ं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
श्रिय़ं वलममात्यांश्च वलवानिह विन्दति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
श्रिय़ं विशिष्टां विपुलं यशो धनं; न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत्सम्प्रति वीक्ष्यसे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
श्रिय़ं ह्यविनय़ो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
श्रिय़ः सकाशादर्थश्च जातो धर्मेण पाण्डव |
१३४ क