वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़मादत्स्व कौन्तेय़ धार्तराष्ट्रान्महावल ||
८२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़स्तु भागः सञ्जज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले |
९५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
श्रिय़ा कुलेन यशसा तपसा च श्रुतेन च |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
७
विराट उवाच
श्रिय़ा च रूपेण च विक्रमेण च; प्रभासि तातानवरो नरेष्विह ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा च वपुषा चैव स्त्रिय़ोऽन्याः सातिरिच्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
श्रिय़ा जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं परिमण्डलम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रिय़ा जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रिय़ा जुष्टः पृथुय़शाः स कुमारवरस्तदा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
श्रिय़ा ज्वलन्तं ध्वजमुन्ममाथ; महारथस्याधिरथेर्महात्मा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महाय़शाः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
श्रिय़ा ज्वलन्दृश्यते वै वालादित्यसमद्युतिः ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा निराशैरधनैस्त्यक्तमित्रैरकिञ्चनैः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
श्रिय़ा परमय़ा युक्ता यतो धर्मस्ततो जय़ः |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
श्रिय़ा परमय़ा युक्तां यथादृष्टां मय़ा पुरा ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा युतमनिर्देश्यं देवचर्योपशोभितम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
श्रिय़ा रूपेण च प्रीतो मैथुनाय़ाजुहाव ताम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
श्रिय़ा विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
श्रिय़ा विहीनः प्रह्राद शोचितव्ये न शोचसि ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
भीष्म उवाच
श्रिय़ा विहीनमासीनमक्षोभ्यमिव सागरम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
जय़द्रथ उवाच
श्रिय़ा विहीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
श्रिय़ा विहीनैरधनैर्नास्तिकैः सम्प्रवर्तितम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
श्रिय़ा विहीनैरलसैः पण्डितैरपलापितम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
भीष्म उवाच
श्रिय़ा विहीनो नमुचे शोचस्याहो न शोचसि ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
श्रिय़ा वृतो यशसा चैव धीमा; न्प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
श्रिय़ा शक्रस्य संवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा सन्तप्यमानेन पाण्डवानां महात्मनाम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
श्रिय़ा हीनोऽपि यो गेहे अम्वेति प्रतिपद्यते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
श्रिय़ा ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहय़त्यविचक्षणम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
श्रिय़ां निवासोऽसि यथा वसूनां; निधानभूतोऽसि तथा क्रतूनाम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
श्रिय़ाभितप्ताः कौन्तेय़ भेदकामास्तथारय़ः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
श्रिय़ै शशंसामरदृष्टपौरुषः; शिवेन तत्रागमनं महर्द्धिमत् ||
८८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
श्रिय़ो विनाशस्तद्ध्यस्य निमित्तं धर्मकामय़ोः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
श्रिय़ो हि कारणाद्राजा सत्क्रिय़ां लभते पराम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्यं प्रविवेश ह |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
युधिष्ठिर उवाच
श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
श्रीः सम्भूता यतो देवी पत्नी धर्मस्य धीमतः ||
१३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
श्रीः सुखस्येह संवासः सा चापि परिपन्थिनी |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
श्रीकुञ्जं च सरस्वत्यां तीर्थं भरतसत्तम |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
श्रीगर्भो विजय़ः शास्ता व्यवहारः प्रजागरः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीगर्भो विजय़श्चैव धर्मपालस्तथैव च ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
श्रीतीर्थं च समासाद्य विन्दते श्रिय़मुत्तमाम् ||
३७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
श्रीधरः श्रीकरः श्रेय़ः श्रीमाँल्लोकत्रय़ाश्रय़ः ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीर उपस्पृशेत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीप्रतापेन चैतस्य तप्यते स सुय़ोधनः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
श्रीप्राणधनदारेभ्य क्षिप्रं स परिहीय़ते ||
६० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमच्चास्य महावुद्धेः सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनः |
११ क