शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
कान्नापदो नोपनमन्ति लोके; परावरज्ञास्तु न सम्भ्रमन्ति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
कान्नु लोकान्गमिष्यामि कृत्वा तत्कर्म दारुणम् ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भरद्वाज उवाच
कान्यत्र परिमाणानि संशय़ं छिन्धि मेऽर्थतः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
कान्स्वगात्रोद्भवान्दोषान्पश्यस्यमितविक्रम |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
कापव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
कापव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात्सिद्धिमाप्तवान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमास्थाय़ जीवतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
कापालीं वृत्तिमास्थाय़ धानामुष्टिर्वनेऽचरः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
कापिलं तेज आसाद्य क्षणेन निधनं गताः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात्किल जाय़से |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
कामं कामानुवन्धं च विपरीतान्पृथक्पृथक् |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
विश्वामित्र उवाच
कामं कामय़मानस्य यदा कामः समृध्यते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
कामं कालेन महता एकान्तित्वं समागतैः |
४९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
कामं कीटः पतङ्गो वा जन्म प्राप्य भवामि वै ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
कामं क्रोधं च मृत्युं च पञ्चेन्द्रिय़जलां नदीम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामं क्रोधं च लोभं च दम्भं दर्पं च भूमिपः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
कामं क्रोधं च लोभं च भय़ं स्वप्नं च पञ्चमम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
कामं क्रोधं च लोभं च भय़ं स्वप्नं च पञ्चमम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमावसेत् |
६० क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
कामं क्रोधं च हर्षं च भय़ं मोहं तथैव च |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
कामं खलु जगत्सर्वं सदेवासुरमानवम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
अश्वत्थामो उवाच
कामं खलु न मे रोषो हैडिम्वे विद्यते त्वय़ि |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
कामं गच्छन्तु कुरवो धनमादाय़ केवलम् |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि वाहुक |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
कामं च मम न न्याय़्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कामं जित्वा च वै मासं सर्वमेधफलं लभेत् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
कामं जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
कामं तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मि; न्यथा कृतस्ते समय़ः सभाय़ाम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
कामं तु नः स्वेषु गुणेषु सङ्गः; कामं च नान्योन्यगुणोपलव्धिः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
कामं तु मे मारुतस्तत्र वासः; प्रक्रीडिताय़ा विवृणोतु देव |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
कामं त्वशोचनीय़ौ तौ रणे सात्वतफल्गुनौ |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कामं त्वय़ा परित्यक्ता गमिष्याम्यहमाश्रमम् |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
कामं देवापि मां विप्र न विजानन्ति तत्त्वतः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
कामं देवाश्च ऋषय़ः सत्त्वस्था नृपसत्तम |
७३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
कामं नरा जीवितं सन्त्यजन्ति; न चाभक्ष्यैः प्रतिकुर्वन्ति तत्र |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
कामं नैतत्तवाख्येय़ं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तः स्ववलसंस्तवम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तो हि पुरुषाः सदा ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तोऽऽत्मवलसंस्तवम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कामं पूर्वं धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् |
४० क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
कामं मत्स्यमुपास्तां हि कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
कामं ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
कामं यथावद्विहितं विधात्रा; पृष्टेन वाच्यं तु मय़ा यथावत् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
कामं युध्य परस्यार्थे वरमेतद्वृणोम्यहम् ||
७९ ख