उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र कुन्त्याः कृष्णस्य संनिधौ |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र द्रोणस्याद्य चिकीर्षितम् |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
श्रुतं ते वचनं सर्वं हेतुय़ुक्तं मय़ा विभो |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं दानफलं तात यत्त्वय़ा परिकीर्तितम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपाय़नादपि ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं देवरहस्यं ते नारदाद्देवदर्शनात् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
श्रुतं प्रज्ञानुगं चास्य कल्याणमुपजाय़ते ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं प्रिय़मिदं कृष्ण यत्त्वमर्हसि भाषितुम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मय़ुक्तं परं हितम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
श्रुतं भवद्भिर्गदपूर्वजस्य; वाक्यं यथा धर्मवदर्थवच्च |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं भवद्भिर्यत्प्रोक्तं भगवद्भ्यां जगद्धितम् |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं भवद्भिर्यद्वृत्तं सभाय़ां कुरुसंसदि |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात्किल न योत्स्यसि |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
श्रुतं मे तव मार्जार स्वमर्थं परिगृह्णतः |
१०१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं मे तस्य देवस्य नामनिर्वचनं शुभम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भरतश्रेष्ठ पुष्पधूपप्रदाय़िनाम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधिः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतां वर ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे महदाख्यानमेतत्कुरुकुलोद्वह |
१ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं मे सूत कार्त्स्न्येन कर्म पार्थस्य धीमतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं मय़ा कथय़तां व्राह्मणानां महात्मनाम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत्ते तथास्तु तत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
श्रुतं वाप्यनुभूतं वा दृष्टं वा कथय़स्व मे ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
आस्तीक उवाच
श्रुतं विचित्रमाख्यानं त्वय़ा पाण्डवनन्दन |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं वो वचनं वीराः सौहृदाद्यन्महात्मना |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
श्रुतं समर्थमस्तु ते प्रकुर्वतः शुभाः क्रिय़ाः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं हि ते महाराज यथा पार्थेन संय़ुगे |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
श्रुतं हि ते महावाहो लोमशस्यापि तद्वचः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
श्रुतं हि तेन तदभूदद्य तं राजसत्तमम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
राजो उवाच
श्रुतं हि धर्मशास्त्रे मे पठ्यमानं द्विजातिभिः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
श्रुतः स्वय़ंवरो राज्ञा कौसल्येन यशस्विना |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धः काम्वोजानां महारथम् |
६५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धश्चित्रसेनं चमूमुखे |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा ततो राजञ्शत्रूणां समभिद्रुतः |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा तु परिघं गृहीत्वा समताडय़त् |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा त्रिभिर्वाणैः श्रुतकीर्तिस्तु सप्तभिः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा पराक्रान्तमभ्यद्रवत संय़ुगे ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा महाराज चित्रसेनं महीपतिम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतकर्माणं सहदेव इति ||
८२ 6
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्माणमथ वै नाराचेन स्तनान्तरे |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्माणमाहत्य सूतं विव्याध पञ्चभिः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्माणमाय़ान्तं चित्रसेनो महीपतिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्माणमाय़ान्तं मय़ूरसदृशैर्हय़ैः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मापि समरे नाराचेन समर्दितः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतकर्मार्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः |
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकीर्तिं च नवभिः सुतसोमं च पञ्चभिः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
श्रुतकीर्तिं श्रुतनिधिं द्रौपदेय़ं हय़ोत्तमाः |
२५ क