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शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
श्रुतेन किं येन न धर्ममाचरे; त्किमात्मना यो न जितेन्द्रिय़ो वशी ||
९१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
श्रुतेन च सुसम्पन्नः सर्वैर्योधगुणैस्तथा ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
श्रुतेन ज्ञाय़ते सर्वं तच्च त्वं नाववुध्यसे ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
श्रुतेन तपसा वापि श्रिय़ा वा विक्रमेण वा |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
श्रुतेन धीरो वुद्धिमांस्त्वं मतो नः; काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
श्रुतेन व्रह्मचर्येण तपसा च दमेन च |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतेन श्रोत्रिय़ो भवति तपसा विन्दते महत् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
श्रुतैः सर्वत्र जगति व्रह्मलोकावतारितैः ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
साध्या ऊचुः
श्रुतोऽसि नः पण्डितो धीरवादी; साधुशव्दः पतते ते पतत्रिन् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
श्रुतोऽय़मर्थो रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
श्रुत्वा ऋषिस्तद्वचनं शुकस्य; प्रीतो महात्मा पुनराह चैनम् |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कर्णं कल्यमुदारवीर्यं; क्रुद्धः पार्थः फल्गुनस्यामितौजाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा कर्णं मुषितं धार्तराष्ट्रा; दीनाः सर्वे भग्नदर्पा इवासन् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा कर्णं हतं युद्धे पुत्रांश्चैवापलाय़िनः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा कर्णस्य निधनमश्रद्धेय़मिवाद्भुतम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कर्णो वचः क्रूरं ततश्चिच्छेद कार्मुकम् ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं वालार्कसमतेजसम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा कुमारं जातं तु देवय़ानी शुचिस्मिता |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनघ ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
यक्षा ऊचुः
श्रुत्वा कुरु यथान्याय़ं विमानमिह तिष्ठताम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कृष्णौ मय़ा ग्रस्तं सौभद्रमतिमानिनौ |
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
श्रुत्वा गाथाः क्षमाय़ास्त्वं तुष्य द्रौपदि मा क्रुधः ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा गीतं च तद्दिव्यं वादित्राणां च निःस्वनम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभाय़ाः पाण्डुनन्दन |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मनः ||
८३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा गृहीतं वार्ष्णेय़ं पाण्डवा हतचेतसः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
श्रुत्वा च जीवतः पार्थान्पौरजानपदो जनः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
श्रुत्वा च तत्तथा कार्यं भवता द्विजसत्तम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
कर्ण उवाच
श्रुत्वा च तत्तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिन्दम ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा च तान्पार्थिवपुत्रपौत्रा; न्प्राप्तान्सुवाहुर्विषय़े समग्रान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
वृत्र उवाच
श्रुत्वा च ते वाचमदीनसत्त्व; विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा च तेभ्यस्तत्सर्वं यथावृत्तं महावने |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
श्रुत्वा च धर्म्यं वचनं मह्यं कर्तुमिहार्हसि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
श्रुत्वा च धृतराष्ट्रोऽपि दुर्योधनवचस्तदा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जय़ैषिणाम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
श्रुत्वा च निश्चय़ं तस्य महर्षेस्तिग्मतेजसः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
श्रुत्वा च पाण्डवान्यत्र वासुदेवपुरोगमान् |
१४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा च रथनिर्घोषं सिंहनादं च संय़ुगे |
१ क
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे लोमहर्षणम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा च वीरहीनानामपुत्राणां च योषिताम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा च समहृष्यन्त पुरेव नलसंनिधौ ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
श्रुत्वा च सम्यग्वर्तेत स कामानाप्नुय़ान्नृपः ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा च सा ततः प्रादात्तस्मै ते मणिकुण्डले ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११
डुण्डुभ उवाच
श्रुत्वा च हृदि ते वाक्यमिदमस्तु तपोधन ||
९ ख