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आदि पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा चाथ विधास्यामि पन्नगान्तकरीं मतिम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मवुद्धिपरा भव ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा चैकमना मूढ क्षम वा व्रूहि वोत्तरम् ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
श्रुत्वा चैतं नृपश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
श्रुत्वा चैतद्वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थसंहितम् |
१३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
श्रुत्वा चैतन्मय़ोक्तास्तु भीष्मद्रोणकृपास्तदा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा चैव महावाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा चैवाव्रवीद्देवान्सर्वान्देवपुरोहितः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा चैवाव्रुवन्हृष्टा गच्छामो वय़मप्युत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा चोपस्थितान्वीरान्धृतराष्ट्रोऽपि कौरवः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
गालव उवाच
श्रुत्वा जनन्या वचनं निराशो गुरुदर्शने |
४० क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
श्रुत्वा तं निहतं शाल्वस्तीव्ररोषसमन्वितः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तं प्रतिपद्येथाः प्राज्ञैः सह पुरोहितैः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ७२
वाहुक उवाच
श्रुत्वा तं प्रस्थितो राजा शतय़ोजनय़ाय़िभिः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तं रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
श्रुत्वा तच्च यथावृत्तमिदं वचनमव्रवीत् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तच्छिष्ययो राजन्नाजगाम हलाय़ुधः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
श्रुत्वा तथा करिष्यामि व्यवसाय़ं गिरा तव ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
श्रुत्वा तथा करिष्यामीत्येवं मे धीय़ते मतिः ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
श्रुत्वा तथा विधातव्यमनुष्ठेय़ं च यत्नतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
श्रुत्वा तथा समातिष्ठ यथा धर्मान्न हीय़से ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
श्रुत्वा तदपि कौरव्य यथा श्रेय़स्तथा कुरु ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तदप्रिय़ं राजन्धृतराष्ट्रो महीपतिः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तत्तस्याः क्रिय़तामिति |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
श्रुत्वा तद्भगवान्देवो देवानिदमुवाच ह |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
श्रुत्वा तमव्रुवन्सर्पा आहरामृतमोजसा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
शन्तनुरु उवाच
श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येय़महं न वा |
५० क
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशङ्काः; प्राज्ञा दक्षास्तां तथा चक्रुराशु |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवय़ान्यव्रवीदिदम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाव्रवीत् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु कर्णः पुरुषेन्द्रमच्युतं; निपातितं शान्तनवं महारथम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु कुन्ती तद्वाक्यमर्थकामेन भाषितम् |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु कुरुराजस्य वाक्यानि करुणानि ते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु तं महाशव्दं पाण्डूनां पुत्रगृद्धिनाम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात्ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन् ||
१२ ग
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु तद्वचनं पार्थिवस्य; सर्वे पुनः स्वस्तिकपाणय़श्च |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
श्रुत्वा तु तद्वचस्तेषामग्निमाहूय़ लोककृत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
श्रुत्वा तु तद्वचो घोरं पिता ते जनमेजय़ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा तु तस्य तद्वाक्यं स विप्रो भृशहर्षितः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा तु तस्य ता वाचो वह्ववद्धप्रलापिनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु ते तस्य वचः प्रतीता; स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु तेषां द्विजसत्तमानां; कृतोपवासा रजनीं नरेन्द्राः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु द्वैरथं ताभ्यां तत्र योधाः समन्ततः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु धृतराष्ट्रस्तद्राजा सुमहदप्रिय़म् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु निनदं भीमं तावकानां महाहवे |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा तु निर्जितं कर्णमसकृद्भीमकर्मणा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु निहतं भीष्मं राधेय़ः पुरुषर्षभः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु निहतं शल्यं धर्मपुत्रं च पीडितम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु नृपतिर्वीरं पितरं वभ्रुवाहनः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
श्रुत्वा तु नृपशार्दूल प्रकुरुष्व यथेप्सितम् ||
३२ ख