स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु पाण्डवाः सर्वे मातुर्वचनमप्रिय़म् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
व्यास उवाच
श्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत्संवर्तः परय़ा मुदा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा तु पार्थिवाः सर्वे दमय़न्त्याः स्वय़ंवरम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः सम्प्राप्तं स्वपुरोत्तमम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु भैरवं नादमुपय़ाय़ा जवेन माम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निस्वनम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु राधेय़वचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य तावका जय़गृद्धिनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य पाण्डवस्य महात्मनः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य पूजय़ित्वा च पार्थिवाः |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्याः स विप्रः प्राञ्जलिः स्थितः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तुभ्यमाचार्यस्य कृपस्य च |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तेषां व्राह्मणानां युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्छितः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
सूत उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तेषां सर्वेषामिति चेति च |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तेषामश्वत्थामा महावलः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वय़म् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्निय़तवाङ्मनाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वचनं भीष्मो वासुदेवस्य धीमतः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वचनं राज्ञां धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वाक्यं तममृष्यमाणा; ज्येष्ठाज्ञय़ा चोदिता धार्तराष्ट्राः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु वाक्यानि पुरोहितस्य; यान्युक्तवान्भारत धर्मराजः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु विजय़ं तस्य कुमारस्यामितौजसः |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
श्रुत्वा तु सर्पसत्राय़ दीक्षितं जनमेजय़म् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत्समुपाचर ||
२०४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
श्रुत्वा त्वत्तः शुभे वाक्यं संविधास्याम्यहं तथा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
श्रुत्वा त्वत्तो भृगोर्भार्यां हरिष्याम्यहमाश्रमात् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
श्रुत्वा त्वमेतदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग्भविष्यसि ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते |
२३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
श्रुत्वा दम्पतिधर्मं वै सहधर्मकृतं शुभम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
श्रुत्वा दुर्योधनस्तत्र समेतान्सर्वपार्थिवान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा दुर्योधनो राजा किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा दुर्योधनो वाक्यमप्रिय़ं कुरुसंसदि |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तत्र शर्मिष्ठय़ा हताम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र वभूवुर्दीनमानसाः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा द्वैपाय़नवचो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
भीष्म उवाच
श्रुत्वा धर्मविदां श्रेष्ठः परां मुदमवाप ह ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत्तदा ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्छितः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत्कुरुनन्दन ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मय़ः समजाय़त ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ||
१९१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा निनादं त्वथ कौरवाणां; हर्षाद्विमुक्तं सह शङ्खशव्दैः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमव्रवीत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमव्रवीत् ||
१३ ख