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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमव्रवीत् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा पतींश्च पुत्रांश्च पाण्डवैर्निहतान्युधि ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा पर्व त्विदं नित्यमवाप्स्यन्ति परां गतिम् ||
२८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
श्रुत्वा पुत्रस्य वचनं परमर्षिरुवाच तम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाव्रवीत् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा प्रभद्रका राजन्समकम्पन्त मारिष ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय़ ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् |
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः |
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा भवेय़ं यत्पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा भीष्मस्य तद्वाक्यं राजा दुर्योधनस्तदा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा भीष्मस्य तां वाचं चोदय़ामासतुर्वलम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा भीष्मस्य निधनमप्रहृष्टमना भृशम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा भीष्मोऽव्रवीद्द्रोणं राजानं च सुय़ोधनम् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
श्रुत्वा मनुष्यः सततमिह प्रेत्य च मोदते ||
११७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा मन्त्रं भवप्रोक्तं जग्राहाचिन्त्यविक्रमः ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
श्रुत्वा मम महाराज न सन्तप्तुमिहार्हसि ||
५२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्मन्युमाहारय़त्तदा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा महावलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा मे परमा प्रीतिर्भूय़ः कौतूहलं हि मे ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा यः सुहृदां शास्त्रं मर्त्यो न प्रतिपद्यते |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं विहीन कुलपांसन ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा यथेष्टं च कुरु वीर यत्तव रोचते |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
श्रुत्वा यन्नाजहात्प्राणांस्तन्मन्ये दुष्करं द्विज ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजाथोत्तरं प्रत्यभाषत ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
श्रुत्वा राज्ञस्तथा निष्ठां न त्वशोचन्गतिं च ते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या; स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर |
८२ क
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा वहुविधैः शव्दैर्नाद्यमाना गिरेर्गुहाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा विजय़संय़ुक्तं रथात्पश्चादवातरत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
श्रुत्वा विदीर्येद्धृदय़ं देवानामपि संय़ुगे ||
९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा विनष्टान्वार्ष्णेय़ान्सभोजकुकुरान्धकान् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मय़ोधिनम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा विनिहतं भीष्मं शतधा यन्न दीर्यते ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
श्रुत्वा विरावं वहुधा सन्तप्स्यति सुय़ोधनः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
श्रुत्वा विष्णोः शुभां सत्यां तां वाणीममृतोपमाम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
अलर्क उवाच
श्रुत्वा वै विविधाञ्शव्दांस्तानेव प्रतिगृध्यति |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
श्रुत्वा वैवस्वतवचस्तमहं पुनरव्रुवम् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा व्यामोहमगमच्छोकव्याकुलितेन्द्रिय़ः ||
१०७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा शल्यस्य वचनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा शव्दं तु यत्किञ्चिदुन्मुखौ सुतशङ्कय़ा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा शव्दं भृशं त्रेसुर्जघ्नुर्मम्लुश्च भारत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा शान्तनवो भीष्मः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा शैलगुहासुप्तैः सिंहैर्मुक्तो महास्वनः ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
उत्तङ्क उवाच
श्रुत्वा श्रेय़ोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा स कटुका वाचो जय़युक्ताः पुनः पुनः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो जनाधिपः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा स तस्या विपुलं विलापं पुरुषर्षभः |
१६ क