chevron_left  सुमहत्प्राप्नुय़ात्पापंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सुमहत्प्राप्नुय़ात्पापं गङ्गाय़ामिव कौशिकः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
सुमहत्प्राप्नुय़ात्पापमापगामिव कौशिकः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
सुमहत्प्राप्नुय़ात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सुमहत्प्राप्नुय़ात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
वैशम्पाय़न उवाच
सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
सुमहद्धैर्यमालम्व्य धर्मं सर्वात्मना कुरु ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
सुमहाञ्शव्दसम्पातः कौरवाणां महाभुज |
७ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुमहानपि मत्स्यः सन्स मनोर्मनसस्तदा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
सुमहानभवच्छव्दो वंशानामिव दह्यताम् ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लव्धं यदृच्छय़ा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारय़न्ति वहुश्रुताः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
सुमहान्निनदश्चैव श्रूय़ते विजय़ं प्रति |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
सुमहान्संनिपातोऽभूद्धनञ्जय़वृहन्तय़ोः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
सुमहान्संशय़ो मेऽद्य प्रोक्तं सञ्जय़ यत्त्वय़ा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
सुमित्रः सुकुमारश्च वृकः सत्यधृतिस्तथा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
सुमित्राश्वान्रणे क्षिप्रं द्रोणानीकाय़ चोदय़ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
सुमित्रो नाम राजर्षिर्हैहय़ो मृगय़ां गतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
सुमित्रोऽपनय़त्क्षिप्रमाशां कृशतरीं तदा ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
सुमुक्तैश्चित्रवर्माणं निर्विभेद त्रिसप्तभिः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
सुमुखः सुखकेतुश्च चित्रवर्हस्तथानघः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
सुमुखश्च मय़ा सार्धं देवेशमभिगच्छतु |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
नारद उवाच
सुमुखस्य गुणैश्चैव शीलशौचदमादिभिः ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
सुमुखेन च सौम्येन देवर्षिरमितद्युतिः |
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
सुमुखेन सुनाम्ना च सुनेत्रेण सुवर्चसा ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
नारद उवाच
सुमुखो भवतः पौत्रो रोचते दुहितुः पतिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
सुमुहूर्तं महद्युद्धमासीत्तल्लोमहर्षणम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
सुमुहूर्तमभूद्युद्धं तत्र मे दानवैः सह |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
सुमृष्टं भोजय़ित्वा च व्राह्मणांस्तत्र केशवः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुमृष्टकवचाः शूरास्तैश्च वस्तेऽभ्ययुञ्जत ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुरकार्यं महत्कृत्वा यदाशक्यं दिवौकसैः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
सुरकार्यकरी च त्वं लोकसन्तानकारिणी ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
सुरकार्यमिय़ं काले करिष्यति सुमध्यमा |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
सुरकार्यार्थसिद्ध्यर्थं दृष्टवानसि शङ्करम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम् ||
७३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सुरक्तपीतासितपाण्डुराभा; महागजस्कन्धगता विरेजुः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सुरक्षितं ततः कार्यं पाणिः सर्पमुखादिव ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
सुरक्षितं सुगुप्तं च सर्वाय़ुधसमन्वितम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
सुरक्षितं हि मे वेश्म राजा चैवोग्रशासनः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टुं कथमुत्सहे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम |
६८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
सुरत्वं लोकपालत्वं पुत्रं च नलकूवरम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सुरथं तु ततः क्रुद्धमापतन्तं महारथम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सुरथस्तं गजवरं वधाय़ नकुलस्य तु |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनानागसं तदा ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात्तस्माद्दिवः पत |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
सुरपतिसमविक्रमस्तत; स्त्रिदशवरावरजोपमं युधि |
९ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
सुरपितृगणय़क्षसेवितं; ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् |
३१ क