द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं वादित्राणां च निस्वनम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं वारणानां च वृंहितम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः कोशसञ्चय़रत्नवान् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ||
४८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषान्भेरीपणवमिश्रितान् |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः केशवं प्रत्यवोधय़न् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः सिंहनादैश्च भारत |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मृदङ्गैर्वैणवैरपि |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्वारणानां च वृंहितैः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विविधैर्गीतवादितैः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिसंसृष्टः सिंहनादस्तरस्विनाम् |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः |
१२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
शङ्खभेरीनिनादैश्च कार्मुकाणां च निस्वनैः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
शङ्खभेरीमृदङ्गानां कुञ्जराणां च गर्जताम् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
शङ्खमालापरिकराः शङ्खध्वनिसमस्वनाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खवर्णान्महावेगान्सैन्धवान्साधुवाहिनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खवर्णाश्च तानश्वान्वाणैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खशव्दं च कुर्वाणौ युय़ुधाते परस्परम् ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शङ्खशव्दरवांश्चैव चक्रतुस्तौ रथोत्तमौ |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खशव्दश्च शूराणां दारुणः समपद्यत ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
शङ्खशव्दाः समुरजा भेर्यश्च मधुसूदन |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
शङ्खश्च लिखितश्चास्तां भ्रातरौ संय़तव्रतौ ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
शङ्खश्च लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनिः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
शङ्खस्य चतुरो वाहानहनद्भरतर्षभ ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
शङ्खस्वना दुन्दुभिनिस्वनाश्च; सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान्दध्मुर्हृष्टा मनस्विनः ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शङ्खांश्च दध्मिरे वीरा हर्षय़न्तः परस्परम् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खादींश्च निधीन्सर्वान्निधिपालांश्च सर्वशः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खानकमृदङ्गांश्च प्रवाद्यन्त सहस्रशः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शङ्खानां तुमुलः शव्दः श्रूय़ते लोमहर्षणः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खानां पटहानां च शव्दः समभवद्दिवि ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शङ्खान्प्रदध्मुः समरे प्रहृष्टाः; सकेशवाः सैनिकान्हर्षय़न्तः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
शङ्खान्प्रध्मापय़न्तो वै हृष्टाः परिघवाहवः ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
शङ्खाभाः शङ्खवक्त्राश्च शङ्खकर्णास्तथैव च |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खाश्च दध्मिरे तत्र वाद्यान्यन्यानि यानि च ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
शङ्खिनीं तत्र आसाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
शङ्खे क्षीरमिवासक्तं भवत्वेतत्तथोपमम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
शचीशवज्रप्रहतोऽम्वुदागमे; यथा जलं गैरिकपर्वतस्तथा ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
शचीसहाय़स्तत्राय़ात्सह सर्वैस्तदामरैः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
शठः स्वधर्ममुत्सृज्य तमिच्छेदुपजीवितुम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
शठप्रलापाद्विरता विरुद्धपरिवर्जकाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
शणं सर्जरसं धान्यमाय़ुधानि शरांस्तथा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
शणसर्जरसं व्यक्तमानीतं गृहकर्मणि |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
शणान्वंशं घृतं दारु यन्त्राणि विविधानि च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृष्ठतोऽन्वय़ुः |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
शतं गजानामभिपद्मिनां तथा; शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् |
१६ क