उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
उपपन्ना महेष्वासैर्द्रौपदी दुःखभागिनी ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
भीष्म उवाच
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
उपपन्नान्गुणैः सर्वैर्भीमान्भीमपराक्रमान् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
उपपन्नान्सुखान्भोगानुपाश्नाति मुदा युतः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
उपपन्नेन वाक्येन सततं दुःखभागिनः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
उपपन्नो गुणैः श्रेष्ठो ज्येष्ठः श्रेष्ठेषु वन्धुषु |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
धर्म उवाच
उपपन्नो गुणैः सर्वैः स्वभावेनासि पाण्डव |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
उपपन्नो गुणैरिष्टै रूपवानश्वकोविदः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
उपपन्नो गुरुकुले सत्यवादी सहस्रदः |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
उपपन्नो नरो याय़ाद्विपरीतमतोऽन्यथा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
उपपन्नो ह्यसौ राजा चेदिपाञ्चालकेकय़ैः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोगतम् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्रेक्षणजोऽधर्मः सुमहान्स्यान्महीपतेः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
उपप्रेक्षसि कस्मात्त्वं धर्मज्ञः सन्नराधिप ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तदा दीनमवस्थितम् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
उपप्रैक्षन्त पाञ्चालाः स्मय़मानाः सराजकाः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लवन्त वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
उपप्लवस्तु विज्ञेय़स्तामसस्तस्य पर्वसु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
उपप्लवांस्तथा घोराञ्शशिनस्तेजसस्तथा |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्यं यय़ौ द्रष्टुं पाण्डवानमितौजसः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्यं स गत्वा तु स्कन्धावारं प्रविश्य च |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्यगता सा तु श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्यगतां दृष्ट्वा व्रतवान्व्राह्मणोऽव्रवीत् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्यादथाय़ान्तं जनाः पुरनिवासिनः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
उपप्लव्यादिह क्षत्तरुपय़ातो जनार्दनः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये तु पाञ्चाली द्रौपदी सत्यवादिनी |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषय़ा |
१३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये निविष्टोऽपि धर्ममेव युधिष्ठिरः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
उपप्लव्ये महर्षिर्मे कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये मय़ा सार्धं दिष्ट्या त्वं न स्मरिष्यसि ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये विराटस्य समपद्यन्त सर्वशः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लुतं यथा सोमं राहुणा रात्रिसङ्क्षय़े |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
उपप्लुतं यथा सोमं संशुष्कमिव सागरम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लुतमिवादित्यं सधूममिव पावकम् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
काश्यप उवाच
उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्योपतिष्ठति ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
उपभुङ्क्ते सदा सत्त्वमापः पुष्करपर्णवत् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
उपभोक्तुं मनुष्येभ्यः शरशय़्यागतो ह्यहम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
उपभोगांश्च तपसा व्रह्मचर्येण जीवितम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
उपभोगांस्तु दानेन व्रह्मचर्येण जीवितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
उपभोगैरपि त्यक्तं नात्मानमवसादय़ेत् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
उपमन्यवे मय़ा कृत्स्नमाख्यातं कौरवोत्तम ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
उपमां नाधिगच्छामि पार्थस्य सदृशीं क्षितौ ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
उपमानमिदं राजन्मोक्षविद्भिरुदाहृतम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
उपमामत्र वक्ष्यामि धर्मतत्त्वप्रकाशिनीम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
उपराजेव राजर्धिं ज्ञातिर्न सहते सदा ||
३२ ख