chevron_left  सङ्ग्रामेarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे युध्यमानस्य सततं भीमनन्दन ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सङ्ग्रामे वभ्रुवाहेन संशय़ं चात्र दर्शितः |
२०९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सङ्ग्रामे वा तनुं जह्याद्दद्याद्वा पृथिवीमिमाम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
सङ्ग्रामे विजय़ं प्राप्य तथाल्पं यदि वा वहु ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे व्यवतिष्ठेतां यथा वै वृत्रवासवौ ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
सङ्ग्रामे शात्रवान्निघ्नंस्त्वय़ा दृष्टः पिनाकधृक् ||
९९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे समपश्याम हंसपङ्क्तीरिवाम्वरे ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे सानुवन्धांस्तान्मम पुत्रस्य वैरिणः ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामेण सुघोरेण सत्यमेतद्व्रवीमि वः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
सङ्ग्रामेषु च राजेन्द्र शश्वज्जय़मवाप्स्यसि ||
१८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामेष्वथ वान्यत्र न तान्संस्मर्तुमर्हसि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
सङ्ग्रामेष्वर्जय़ित्वा तु यो वै गाः सम्प्रय़च्छति |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
सङ्ग्रामेऽनीकवेलाय़ामुत्क्रुष्टेऽभिपतत्सु च ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामेऽभिमुखा मृत्युं प्रप्नुय़ामेति मानद ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
सङ्ग्रामय़ज्ञः सुमहान्यश्चान्यो युध्यते नरः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
सङ्ग्राह्यो वसुधापालैर्भृत्यो भृत्यवतां वर ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
सङ्घट्टय़ामास तदा विधानवलचोदिता ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्घर्षजननस्तस्मात्कन्यागर्भो विनिर्मितः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
सङ्घर्षशीलाश्च सदा भवन्त्यन्योन्यकारणात् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
सङ्घर्षात्पावकं मुक्त्वा समेय़ातां महीतले ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
सङ्घर्षेण महार्चिष्मान्पावकः समजाय़त ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
सङ्घातः पार्थिवो धातुरस्थिदन्तनखानि च |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सङ्घातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
सङ्घातवान्मर्त्यलोकः परस्परमपाश्रितः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
सङ्घातवृत्तय़ो ह्येते वर्तन्ते हेत्वहेतुभिः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
सङ्घाताः स्म प्रदृश्यन्ते तत्र तत्र विशां पते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २२
सूत उवाच
सङ्घातितमिवाकाशं जलदैः सुमहाद्भुतैः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सङ्घातैरासनभ्रष्टैरश्वारोहैर्गतासुभिः |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सङ्घातो राजपुत्राणां सर्वेषामभवत्तदा |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
सङ्घातो रूपमाय़ासः सुखदुःखे हिमातपौ |
२ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सङ्घातय़न्तः कौन्तेय़ राजानः पापवुद्धय़ः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सचक्रकूवररथं साश्वध्वजपताकिनम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
सचक्रा सहुडा चैव सय़न्त्रखनका तथा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सचक्राश्च विचक्राश्च रथैरेव महारथाः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय २८३
मार्कण्डेय़ उवाच
सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
सचन्दनवने रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सचापाः साङ्गुलित्राणाः सखड्गाः साङ्गदा रणे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
सचारणपिशाचे वै सदेवर्षिनिशाचरे ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सचिवं देशकालज्ञं सर्वसङ्ग्रहणे रतम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
सचिवा भृत्यवर्गाश्च गुरवश्चैव ते विभो ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सचिवाश्चास्य चत्वारः शुक्लमाल्यानुलेपनाः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
सचिवेनोपनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना ||
४९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
सचिवैः संवृतो राजा रथे नाग इव श्वसन् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्वहुभिर्मुख्यकर्मभिः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सचिवो वृषवर्मा ते सूतः परमवीर्यवान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति; स चेष्टते चेष्टय़ते च सर्वम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति; स चेष्टते चेष्टय़ते च सर्वम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति; स चेष्टते चेष्टय़ते च सर्वम् |
२५ क