आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना |
१५३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाश्च सप्ततिः प्रोक्ता यथावदभिसङ्ख्यया |
१९० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाश्चैकादश ज्ञेय़ाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ||
१०४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
श्लोकेनानेन कौरव्य पप्रच्छ स मुनिस्तदा ||
१० ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
श्लोकैश्चतुर्भिर्भगवान्पुत्रमध्यापय़च्छुकम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
श्लोकौ चोशनसा गीतौ पुरा तात महर्षिणा |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
श्लोकौ न्याय़मवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थं तत्त्वदर्शिभिः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
श्व इदानीं प्रदृश्येथाः पुरुषो भव दुर्मते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
श्व इदानीं स्वसन्देहं प्रक्ष्यामि त्वं पितामह |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
श्वः प्रभाते भवान्द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
श्वः प्रभाते वने दृश्ये यास्यावोऽनुमते तव |
७९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
श्वः प्रिय़ं सुमहच्छ्रुत्वा विशोका भव नन्दिनि ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
श्वः शिरः श्रोष्यसे तस्य सैन्धवस्य रणे हृतम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
श्वः श्वः पापीय़दिवसाः पृथिवी गतय़ौवना ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
श्वः सदेवाः सगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वः समेष्याम इत्युक्त्वा यथेष्टं त्वरिता यय़ुः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
श्वः सर्वसैन्यानुत्सृज्य जहि कर्ण धनञ्जय़म् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
श्वकाकवलगृध्राणां सधर्माणो नराधिप ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
राजन्य उवाच
श्वखराणां रजःसेवी कस्मादुद्विजसे गवाम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
श्वगृध्रकङ्ककाकोलभासगोमाय़ुवाय़साः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
श्वगृध्रगोमाय़ुय़ुतो राजहंससमो ह्यसि ||
४६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
श्वचर्यामतिमानं च सखिदारेषु विप्लवम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वदृतौ क्षीरमासक्तं व्रह्म वा वृषले यथा |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
श्वपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
श्वपाकवन्म्लेच्छगणान्हत्वा चान्यान्पृथग्विधान् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
श्वपाकवैश्यशूद्राणां क्षत्रिय़ाणां च योनिषु ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
श्वपाकाः पुल्कसाः स्तेना निषादाः सूतमागधाः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वभिः संस्पृष्टमन्नं च भागोऽसौ रक्षसामिह ||
२१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वभिः सह महाराज तत्रैवान्तरधीय़त ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
श्वभिर्यश्च परिक्रामेद्यः शुना दष्ट एव च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
श्वभिस्तां खादय़ेद्राजा संस्थाने वहुसंवृते ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वय़ोभ्यश्चावपेद्भुवि |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वय़ोभ्यश्चावपेद्भुवि |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
श्वभ्रवत्तोय़हीनं च दुर्गमं वहुकण्टकम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
श्वभ्रे ते पततां चक्रमिति मे व्राह्मणोऽवदत् |
३१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वरूपधारिणा पुत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च |
७० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
श्ववराहोष्ट्ररूपाश्च हय़गोमाय़ुगोमुखाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
श्ववर्वरखरान्हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
श्वशत्रुर्भगवन्नत्र द्वीपी मां हन्तुमिच्छति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वशुरं देवकार्यैश्च वाचः संय़मनेन च ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
श्वशुरं वद्धनय़ना देवी प्राञ्जलिरुत्थिता ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वशुरं समनुज्ञाप्य विविशुर्जाह्नवीजलम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाः सपितामहाः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
पूरुरु उवाच
श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद्यस्ते हरति पुष्करम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वशुरात्प्रीतिदाय़ं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनय़ोरुभय़ोरपि |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
श्वशुरो द्रुपदोऽस्माकं सेनामग्रे प्रकर्षतु ||
१६ ख