अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
श्वित्री कुष्ठी च क्लीवश्च तथा यक्ष्महतश्च यः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
श्वित्रे कुष्ठेऽग्निदाहे च सिध्मापस्मारय़ोरपि ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८
विनतो उवाच
श्वेत एवाश्वराजोऽय़ं किं वा त्वं मन्यसे शुभे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
श्वेतं कमण्डलुं विभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
श्वेतं करेणुं मम पुत्रनागं; यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि वालम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
श्वेतं गिरिं प्रवेक्ष्यामो मन्दरं चैव पर्वतम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् |
५७ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतं यय़ौ स ततः प्रेक्ष्यमाणो; महार्णवो येन महानुभावः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
श्वेतः कृतय़ुगे वर्णः पीतस्त्रेताय़ुगे मम |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
श्वेतकेतुः कोहलश्च विपुलो देवलस्तथा |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतकेतुरिति ख्यातः पुत्रस्तस्याभवन्मुनिः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतकेतोः किल पुरा समक्षं मातरं पितुः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
श्वेतच्छत्रपताकाभिश्चामरव्यजनेन च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
श्वेतच्छत्रसहस्राणि सध्वजाश्च महारथाः |
१३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
श्वेतच्छत्राण्यशोभन्त वारणेषु रथेषु च ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
श्वेतच्छत्रेण निष्केण चामरव्यजनेन च ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतच्छत्रैः पताकाभिश्चामरैश्च सुपाण्डुरैः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
श्वेतद्वीपं समासाद्य येन दृष्टः स्वय़ं हरिः ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
श्वेतद्वीपादुपावृत्ते तस्मिन्वा सुमहात्मनि ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
श्वेतद्वीपान्निवृत्तश्च नारदः परमेष्ठिजः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतद्वीपे त्वय़ा दृष्ट आवय़ोः प्रकृतिः परा ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतद्वीपे मय़ा दृष्टास्तादृशावृषिसत्तमौ |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वेतपर्वतमारूढ एक एव विभीषणः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वेतपर्वतमारूढा मोक्ष्यन्तेऽस्मान्महाभय़ात् ||
६७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतपर्वतमासाद्य न्यवसत्पुरुषर्षभः ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतपर्वतरूपेभ्यो गृहेभ्यस्तास्त्वपाक्रमन् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतपर्वतसङ्काशमृषिसङ्घैर्निषेवितम् |
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतलोहितपर्यन्ताः कृष्णग्रीवाः सविद्युतः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
श्वेतवर्माम्वरोष्णीषो व्यूढोरस्को महाभुजः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतवाजिवलाकाभृद्गाण्डीवेन्द्राय़ुधोज्ज्वलः ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेता रजतसङ्काशा रथे युज्यन्तु ते हय़ाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान्सर्वलक्षणलक्षितान् ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
श्वेताः काञ्चनसंनाहा रथे युज्यन्ति मे हय़ाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
श्वेताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
श्वेताः पुमांसो गतसर्वपापा; श्चक्षुर्मुषः पापकृतां नराणाम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेताङ्गा लोहितग्रीवाः पिङ्गाक्षाश्च तथापरे |
१०० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
श्वेताण्डाः कुक्कुटाण्डाभा दण्डकेतुमुदावहन् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वेतातपत्रः सोष्णीषः शुक्लमाल्यविभूषणः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेतानां यतिनामाह एकान्तगतिमव्ययाम् ||
७९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
श्वेताभ्र इव तीक्ष्णांशुं ददृशुः कुरुपाण्डवाः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
श्वेताभ्रशिखराकारः प्रय़यौ द्वारकां प्रति ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्वं धनञ्जय़ः |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
श्वेताश्वोऽपि महाराज व्यधमत्तावकं वलम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
श्वेताश्वौ पुरुषादित्यावास्थितावरिमर्दनौ |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
श्वेताश्वय़ुक्तं च सुघोषमग्र्यं; रथं महावाहुरदीनसत्त्वः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
श्वेतास्तस्मिन्वातवेगाः सदश्वा; दिव्या युक्ताश्चित्ररथेन दत्ताः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
श्वेतास्तु प्रतिविन्ध्यं तं कृष्णग्रीवा मनोजवाः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
श्वेतेन याति यानेन सर्वलोकानसंवृतान् ||
२८ ख